(उबैदुज्जमा रहमानी)
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।
हिंदुस्तान की इल्मी, अदबी और दीनी दुनिया ने एक ऐसी शख्सियत खो दी है, जिसकी पूरी ज़िंदगी इल्म की ख़िदमत, तालीम की तरक़्क़ी और अरबी भाषा व साहित्य के फ़रोग़ के लिए गुज़री। हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर्रहमान आज़मी नदवी रहमतुल्लाहि अलैह की रिहलत न सिर्फ़ नदवतुल उलमा, बल्कि हिंदुस्तान की पूरी इल्मी दुनिया के लिए एक बड़ा नुकसान है।
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी उन बुज़ुर्गों में थे जिनकी पहचान केवल एक मदरसे के प्रिंसिपल या एक आलिम के तौर पर नहीं थी। वे आलिम, उस्ताद, लेखक, पत्रकार, ख़तीब और अरबी भाषा के माहिर थे। उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने अपने इल्म को किताबों तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसे नई नस्ल तक पहुँचाने को अपनी ज़िम्मेदारी समझा।
नदवा से गहरा रिश्ता
मऊ की सरज़मीन पर जन्म लेने वाले मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी ने शुरुआती तालीम जामिया मिफ़्ताहुल उलूम में हासिल की। इसके बाद 1952 में वे दारुल उलूम नदवतुल उलमा, लखनऊ पहुँचे। यही संस्थान आगे चलकर उनकी पूरी ज़िंदगी की सबसे अहम पहचान बन गया।
नदवा में उन्होंने उस दौर के बड़े उलेमा और उस्तादों से इल्म हासिल किया। मौलाना शाह मुहम्मद हलीम अता सलोनवी, मौलाना अब्दुल हफ़ीज़ बल्यावी, डॉक्टर अब्दुल्लाह अब्बास नदवी और मौलाना सैयद मुहम्मद राबे हसनी नदवी जैसी इल्मी शख्सियतों से उन्होंने फ़ैज़ पाया। नदवा की आधिकारिक जीवनी भी उनके इन उस्तादों और उनके शुरुआती इल्मी सफ़र की तस्दीक करती है।
1954 में फ़ारिग़ होने के बाद वे उसी संस्थान में उस्ताद नियुक्त हो गए। यानी जिस जगह से उन्होंने इल्म हासिल किया, उसी जगह को अपनी पूरी ज़िंदगी इल्म बाँटने का मरकज़ बना लिया।
अरबी पर मज़बूत पकड़
उनकी इल्मी प्यास केवल नदवा तक सीमित नहीं रही। आगे उन्होंने इराक़ का सफ़र किया और अरबी भाषा व उसके उसूलों की ख़ास तालीम हासिल की। बाद में जामिया अल-अज़हर से भी उनका गहरा इल्मी रिश्ता रहा।
अरबी भाषा पर उनकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि उनकी तहरीर और तक़रीर को हिंदुस्तान के बाहर अरब दुनिया में भी सम्मान की नज़र से देखा जाता था।
नदवा की ज़िम्मेदारी
साल 2000 में मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी को दारुल उलूम नदवतुल उलमा का महतम्मिम बनाया गया। इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक इस बड़े इल्मी मरकज़ की ज़िम्मेदारी संभाली।
नदवा की आधिकारिक वेबसाइट आज भी उन्हें अपने प्रमुख प्रशासनिक और इल्मी नेतृत्व में दर्ज करती है।
उनकी शख्सियत में एक तरफ़ पुराने इल्मी सिलसिले की गहराई थी तो दूसरी तरफ़ बदलते दौर की ज़रूरतों को समझने की सलाहियत भी थी। यही वजह थी कि वे नदवा की उस रिवायत के अहम प्रतिनिधि बने जिसमें दीन के साथ भाषा, साहित्य, पत्रकारिता और आधुनिक ज़रूरतों को भी अहमियत दी जाती है।
‘अल-बअसुल इस्लामी’ की ख़िदमत
मौलाना की एक बड़ी पहचान अरबी मासिक ‘अल-बअसुल इस्लामी’ से भी जुड़ी रही। नदवतुल उलमा की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ इस रिसाले की शुरुआत 1955 में मौलाना सैयद मुहम्मद अल-हसनी ने अपने साथियों के साथ की थी और मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी लंबे समय तक इसके संपादकीय काम से जुड़े रहे। बाद में वे इसके प्रधान संपादक बने।
यह रिसाला हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि अरब देशों में भी पढ़ा जाता रहा। इस तरह मौलाना ने अपनी क़लम के ज़रिए हिंदुस्तान की इल्मी आवाज़ को अरब दुनिया तक पहुँचाने में अहम किरदार अदा किया।
क़लम और किताबों का सफ़र
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी ने अरबी और उर्दू दोनों भाषाओं में लिखा। उनके लेखन में इस्लामी विचार, दावत, तालीम, समाज और इंसानी ज़िंदगी से जुड़े विषय मिलते हैं।
उनकी मशहूर किताबों में ‘इस्लाम और मग़रिब’, मौलाना अबुल हसन अली नदवी की यादों और सवानेह से जुड़ी तहरीरें, ‘ख़ुतबात इल्म व दावत’, ‘सूरह यूसुफ़, दुरूस व इबर’ और दूसरी कई इल्मी किताबें शामिल हैं।
उनकी तहरीर की खासियत यह थी कि इल्मी बात को भी ज़रूरत के मुताबिक़ सादा और असरदार अंदाज़ में पेश किया जाता था।
उस्ताद की हैसियत
मौलाना की असली विरासत शायद उनकी किताबों से भी ज़्यादा उनके शागिर्द हैं।
दशकों तक नदवा में पढ़ाते हुए उन्होंने हजारों छात्रों की इल्मी और फ़िक्री तरबियत की। उनकी कोशिश थी कि छात्र सिर्फ़ किताबें पढ़ने वाले न बनें, बल्कि अपने दौर को समझने वाले, भाषा और इल्म पर पकड़ रखने वाले और समाज के लिए फ़ायदेमंद इंसान बनें।
यही वजह है कि उनके जाने के बाद उनकी कमी सिर्फ़ एक पद की खाली जगह नहीं है। यह एक ऐसे उस्ताद की कमी है जिसने कई नस्लों को इल्म से जोड़ा।
सम्मान और एतराफ़
उनकी इल्मी और अदबी सेवाओं को अलग-अलग संस्थानों ने सम्मान दिया। 2013 में इंस्टीट्यूट ऑफ़ ऑब्जेक्टिव स्टडीज़, नई दिल्ली ने उन्हें लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया। 2019 में ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती लैंग्वेज यूनिवर्सिटी ने उन्हें मानद डी.लिट. की डिग्री दी। 2026 में भी उनकी दीर्घकालीन इल्मी और दीनी सेवाओं के लिए उन्हें लाइफ़टाइम अचीवमेंट सम्मान दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
ये सम्मान उनकी असल पहचान नहीं, बल्कि उनकी दशकों की ख़िदमत का एक छोटा-सा एतराफ़ थे।
एक दौर का अंत
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी की रिहलत के साथ नदवा की उस पीढ़ी का एक और बड़ा नाम हमसे जुदा हो गया, जिसने इल्म को सिर्फ़ मदरसों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखा।
उन्होंने अरबी भाषा को मज़बूत किया, किताबों को ज़रिया बनाया, पत्रकारिता को ख़िदमत समझा और तालीम को अपनी ज़िंदगी का मक़सद बनाया।
उनकी सबसे बड़ी विरासत उनकी इमारतें या ओहदे नहीं, बल्कि उनका इल्म, उनकी तहरीर और उनके शागिर्द हैं।
आज जब उनकी रिहलत की ख़बर सामने है तो दिल बेइख़्तियार कह उठता है,
एक शख्सियत चली गई, लेकिन इल्म की वह रौशनी पीछे छोड़ गई जो आने वाली नस्लों का रास्ता दिखाती रहेगी।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

