कुरआन और सुन्नत की रोशनी में फिनटेक का इस्तेमाल

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(सैय्यद जाहिद)

नवंबर 2023 में सोशल मीडिया पर गाज़ा के एक बुज़ुर्ग का वीडियो वायरल हुआ था। छोटे-छोटे बच्चों की लाशों के सामने उन्होंने कहा था कि मैं रसूलुल्लाह ﷺ से इस उम्मत की शिकायत करूँगा कि इसने हमें इस हाल में धोखा दिया। रसूलुल्लाह ﷺ की तालीम और तरबियत ने तो इस कौम को बेहतरीन उम्मत बनाया था, लेकिन आज हमने अपने दीन को टुकड़ों में बाँटकर खुद को अलग-अलग फिरकों में बाँट लिया है। कुरआन में रसूलुल्लाह ﷺ को ऐसे लोगों से अलग रहने का हुक्म दिया गया है, जिन्होंने अपने दीन को बाँटकर अलग-अलग गिरोह बना लिए। (कुरआन 6:159)

आखिरत में उस बुज़ुर्ग की शिकायत पर अल्लाह तआला जो भी फैसला करेगा, उससे इस दुनिया में कौम के मौजूदा हालात अपने आप नहीं बदलने वाले। इस दुनिया में इंसान को मेहनत और संघर्ष करना पड़ता है और उसे वही मिलता है, जिसकी वह कोशिश करता है। खुद रसूलुल्लाह ﷺ को दावत-ए-हक़ देने पर ताइफ़ में पत्थर मारे गए और जंग-ए-उहुद में आपका मुबारक चेहरा ज़ख्मी हुआ और दाँत टूट गए। इसके बावजूद आप ﷺ सब्र और हिम्मत के साथ अपने मिशन पर डटे रहे, यहाँ तक कि हक़ का पैगाम दुनिया में फैलता चला गया।

इस दुनिया में हम पर आने वाली बहुत-सी मुसीबतें हमारे अपने कामों का नतीजा होती हैं, और अल्लाह बहुत-सी गलतियों को माफ भी कर देता है। (कुरआन 42:30) बेहतरीन उम्मत होने के नाते हमें सोचना चाहिए कि हमसे ऐसी कौन-सी गलतियाँ हुई हैं कि आज फिलिस्तीन तबाही का सामना कर रहा है और कितने ही मजलूम अपनी ही कौम से शिकायत कर रहे हैं? रसूलुल्लाह ﷺ की तरबियत पाए सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने अपने अच्छे अखलाक और परहेज़गारी से लोगों के दिल जीते। यही उनके दीन की दावत फैलने का एक बड़ा जरिया बना।

बाद के दौर में भी मुसलमानों ने परहेज़गारी के साथ इल्म और समझ के मैदान में तरक्की की। इस्लामी सुनहरे दौर में उन्होंने दुनिया भर में इल्म, हिकमत, कारोबार और तकनीक की तरक्की में अहम भूमिका निभाई। लेकिन कामयाबी के बाद ऐसे हालात भी आए, जब कुछ अहले-इल्म ने आने वाले दौर के लिए जरूरी तकनीक पर ध्यान देने के बजाय कम उपयोगी विषयों पर बहस-मुबाहिसे में ज्यादा वक्त लगाया। जब दूसरी कौमें प्रिंटिंग प्रेस जैसी तकनीक लेकर आईं, तो कुछ मुस्लिम हलकों में इसे अपनाने को लेकर विरोध हुआ और इसे अपनाने में देर भी हुई।

माली मामलों में 16वीं सदी तक कैश वक्फ एक मजबूत व्यवस्था बन चुका था। इसके जरिए कारोबार को पूँजी मिलती थी और भलाई के कामों के लिए भी पैसा जुटाया जाता था। लेकिन इस व्यवस्था को अगली पीढ़ियों तक सुरक्षित तरीके से पहुँचाने के लिए जरूरी तकनीक और संस्थागत व्यवस्था को आगे बढ़ाने पर उतना काम नहीं हुआ। 17वीं सदी के आखिर तक यूरोप में ऐसी वित्तीय व्यवस्था विकसित होने लगी, जिसमें आम लोगों की छोटी-छोटी बचत जमा की जा सके और जरूरत के समय उन्हें वापस भी किया जा सके। 18वीं से 20वीं सदी के दौरान बैंकिंग और दूसरे वित्तीय संस्थानों का दायरा बढ़ता गया।

यूरोप ने शिक्षा और तकनीक पर मेहनत करके नई वित्तीय व्यवस्था तैयार की। इसके साथ औद्योगिक क्रांति आगे बढ़ी और पूँजी, कारोबार तथा उद्योगों का संतुलन यूरोप की ओर खिसकता चला गया। कमजोर होती उस्मानी खिलाफत को भी यूरोप से कई बार कर्ज लेना पड़ा। कर्ज के दबाव में ऐसे समझौते करने पड़े, जिनसे आगे चलकर वक्फ की व्यवस्था और कमजोर हुई।

आज मुसलमान सिर्फ शिक्षा और तकनीक के मामले में ही पीछे नहीं हैं, बल्कि आर्थिक योजना बनाने और पैसे का सही प्रबंधन करने में भी कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अरब देशों के पास बड़ी दौलत और अपनी सरकारें होने के बावजूद कई अहम क्षेत्रों में वे अमेरिकी तकनीक और सैन्य ताकत पर निर्भर हैं। उनके विदेशी निवेश, तेल उद्योग और सुरक्षा व्यवस्था के कई हिस्से भी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और तकनीकी ढाँचों से जुड़े हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब जरूरी तकनीक और सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता हो, तो फिलिस्तीन के मामले में स्वतंत्र और प्रभावी फैसले लेना कितना मुश्किल हो जाता है।

इस्लामी बैंकिंग: कोशिशें और चुनौतियाँ

इस दौर में इस्लामी बैंकिंग के नाम पर दुनिया भर में जो काम हुआ है, उसका भी जायजा लेना जरूरी है। 1973 में इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक बनाने का ऐलान हुआ। 1975 में दुबई इस्लामिक बैंक और 1977 में कुवैत फाइनेंस हाउस तथा फैसल इस्लामिक बैंक जैसे संस्थान सामने आए। 1991 में एएओआईएफआई की स्थापना हुई, जिसका मकसद इस्लामी वित्तीय संस्थानों के लिए लेखांकन, ऑडिट और शरिया से जुड़े मानक तैयार करना था। आगे चलकर सुकूक यानी इस्लामी वित्तीय प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल भी बढ़ा।

इन कोशिशों के बावजूद दुनिया के बहुत-से मुसलमान इस्लामी बैंकिंग की सुविधाओं से फायदा नहीं उठा पा रहे हैं। इसकी एक वजह यह है कि ऐसे संस्थान हर जगह मौजूद नहीं हैं। जहाँ मौजूद हैं, वहाँ भी साझेदारी और मुज़ारबत के उसूलों पर कारोबार करना कई बार मुश्किल होता है। इसके लिए ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें पूँजी लगाने वाले और कारोबार चलाने वाले के बीच भरोसा हो, हिसाब-किताब साफ हो और मुनाफे के साथ नुकसान की जिम्मेदारी भी पहले से तय हो।

कुरआन उन लोगों को सख्त चेतावनी देता है, जो सोना-चाँदी जमा करके रखते हैं और अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते। (कुरआन 9:34) कुरआन यह भी बताता है कि माल और औलाद इंसान के लिए आजमाइश हैं और अल्लाह के पास बहुत बड़ा बदला है। इसलिए जहाँ तक हो सके, अल्लाह से डरें, उसके हुक्म सुनें और मानें तथा उसकी राह में खर्च करें। जो लोग अपने दिल की तंगदिली से बचा लिए गए, वही कामयाब हैं। (कुरआन 64:15-16)

अगर हमने अल्लाह की नाफरमानी की और कंजूसी से काम लिया, तो यह हमारे लिए नुकसान का कारण बन सकता है। लेकिन अगर हमने सही रास्ता अपनाया, तो यही माल हमारी कामयाबी का जरिया बन सकता है। इसलिए पैसे की योजना बनाते समय कुरआन और सुन्नत से रहनुमाई लेना जरूरी है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने उहुद पहाड़ जितना सोना होने की मिसाल देते हुए फरमाया कि कर्ज की अदायगी के लिए रखी गई रकम के अलावा, तीन रातें गुजरने के बाद उनके पास उसका कुछ हिस्सा भी बचा रहना उन्हें पसंद नहीं था। इस हदीस से माल को सिर्फ जमा करके रखने के बजाय जरूरतमंदों पर खर्च करने की अहमियत सामने आती है। साथ ही यह भी पता चलता है कि कर्ज की अदायगी को प्राथमिकता देना जरूरी है। (सहीह अल-बुखारी, 6445)

कर्ज दूसरे इंसान का हक है। अगर कोई व्यक्ति कर्ज चुकाने की हैसियत रखता है, फिर भी जानबूझकर भुगतान में देर करता है, तो यह जुल्म है। (सहीह अल-बुखारी, 2400) इसलिए दूसरों के हक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विरासत बाँटने से पहले मरहूम के कर्ज और वसीयत से जुड़े हक पूरे किए जाते हैं, फिर बाकी संपत्ति वारिसों में बाँटी जाती है। (कुरआन 4:11)

अगर हम रसूलुल्लाह ﷺ की तरह हर मुश्किल में साबित कदम नहीं रह सकते, तो हमें सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम की जिंदगी से अपनी हैसियत के मुताबिक अमल करने का रास्ता तलाश करना चाहिए। हर इंसान अपनी क्षमता, समय, हुनर और माल के हिसाब से दीन और समाज की भलाई में हिस्सा ले सकता है।

माल में दूसरों का हक

हमारे माल में दूसरों के हक के बारे में कुरआन साफ रहनुमाई करता है। रिश्तेदारों, जरूरतमंदों और मुसाफिरों को उनका हक देने की ताकीद की गई है। यही उन लोगों के लिए बेहतर है, जो अल्लाह की खुशी चाहते हैं। (कुरआन 30:38)

कुरआन में जब पूछा गया कि क्या खर्च किया जाए, तो जवाब में ‘अल-अफ्व’ का जिक्र आता है। इसका मतलब जरूरत से ज्यादा बचने वाला माल भी समझा गया है। (कुरआन 2:219) हमें अपनी आर्थिक हालत का जायजा लेते रहना चाहिए। कुरआन बताता है कि शैतान इंसान को गरीबी का डर दिखाता है, जबकि अल्लाह अपनी तरफ से माफी और फज़्ल का वादा करता है। (कुरआन 2:268)

घर की जरूरतें, बच्चों की तालीम, इलाज, रोजगार और भविष्य के लिए बचत, ये सभी हमारी आर्थिक योजना का हिस्सा होने चाहिए। असल सवाल यह है कि हमारी योजना कुरआन और सुन्नत के मुताबिक है या सिर्फ हमारी अपनी ख्वाहिशों और आदतों के मुताबिक?

कुरआन हमें दुनिया और आखिरत, दोनों की भलाई माँगना सिखाता है। वह दुनिया की जरूरतों को पूरी तरह छोड़ने के बजाय दुनिया में रहते हुए आखिरत की कामयाबी हासिल करने की राह दिखाता है। (कुरआन 2:201; 28:77)

इसका मतलब है कि अपनी आर्थिक योजना बनाते समय हमें आखिरत की तैयारी को भी ध्यान में रखना चाहिए। सच तो यह है कि आज हमें ऐसे वित्तीय ढाँचे की जरूरत है, जिसके जरिए लोग आपस में जुड़ सकें और अपने आर्थिक संसाधनों को बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सकें।

ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें लोगों की बचत और निवेश सुरक्षित रहें, उनकी अलग-अलग आर्थिक जरूरतों और जोखिमों को समझा जाए, फैसले लेने की जिम्मेदारियाँ तय हों और हर काम का हिसाब-किताब साफ-साफ रखा जाए। सिर्फ पैसा जमा कर लेना काफी नहीं है; उसे सही जरूरतमंद तक सही तरीके से पहुँचाने की क्षमता भी होनी चाहिए।

सिर्फ किसी निवेश को ‘हलाल निवेश’ कह देने या बड़े मुनाफे का वादा करने से किसी वित्तीय संस्था की विश्वसनीयता साबित नहीं होती। कुरआन ने कारोबार को हलाल और सूद को हराम बताया है। सूद से तौबा न करने वालों के लिए कुरआन में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की तरफ से सख्त चेतावनी आई है। (कुरआन 2:275, 2:278-279)

जरा सोचिए, अगर हम अपने पैसे को सुरक्षित रखने और बढ़ाने में लगे रहें, जबकि जरूरतमंद लोग मजबूरी में सूद पर कर्ज लेते रहें, तो क्या आखिरत में हमसे यह सवाल नहीं होगा कि हमने अपनी बचत और क्षमता का इस्तेमाल लोगों को सूद के बोझ से बचाने के लिए क्या किया?

क्या हमारा यह रवैया रसूलुल्लाह ﷺ और सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम की तालीमात पर अमल करने की मिसाल पेश करता है? क्या समाज में आपसी हमदर्दी और इंसानियत को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी हम पर नहीं है?

फिनटेक से कैसे बेहतर हो सकती है वित्तीय व्यवस्था?

कुरआन तय समय के लिए दिए जाने वाले कर्ज को लिखने, सही तरीके से दर्ज करने और गवाही का इंतजाम करने की रहनुमाई करता है। (कुरआन 2:282) आज के कारोबार में भी साफ कानूनी दस्तावेज और भरोसेमंद रिकॉर्ड बेहद जरूरी हैं।

किस कारोबार में पैसा लगाया जा रहा है? उसे कौन चला रहा है? नुकसान का जोखिम कितना है? हिसाब-किताब कैसे रखा जाता है? और जवाबदेही किसकी होगी? निवेश करने से पहले इन सवालों के जवाब जानना जरूरी है।

आज बहुत-से लोग मेहनत और ईमानदारी से कारोबार करते हैं, लेकिन बिक्री, स्टॉक, उधारी और खर्च का पूरा हिसाब नहीं रख पाते। ऐसे में पैसा लगाने वाला व्यक्ति कारोबार की असली हालत कैसे समझेगा? निवेश के बाद उसकी निगरानी कैसे होगी?

इन जरूरतों को पूरा करने में डिजिटल तकनीक हमारी मदद कर सकती है। बिजनेस ऐप के जरिए रोजाना के लेन-देन का रिकॉर्ड रखा जा सकता है। इन रिकॉर्ड से कारोबार की आमदनी, खर्च, बिक्री और बाकी जरूरी जानकारी समय पर हासिल की जा सकती है। इससे बेहतर फैसले लेने में मदद मिलती है।

हालाँकि तकनीक आर्थिक जोखिम को समझने में मदद कर सकती है, लेकिन उसे पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती। इसके लिए सही जानकारी, प्रशिक्षित कर्मचारी और जिम्मेदारी के साथ फैसले लेना भी जरूरी है।

एक व्यावहारिक कोशिश ऐसी संस्थागत व्यवस्था तैयार करना हो सकती है, जो सूद से बचते हुए लोगों की बचत और कारोबार की जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल बनाए। भारत के कानूनी ढाँचे के भीतर गैर-सूदी सहकारी क्रेडिट सोसाइटी एक संभावित रास्ता हो सकती है, बशर्ते उसका कामकाज लागू कानूनों के मुताबिक हो और उसके पास सही तकनीक, प्रशिक्षित कर्मचारी तथा ईमानदार प्रबंधन हो।

आज डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन भुगतान के कई साधन मौजूद हैं। इनके साथ सूद से बचते हुए वित्तीय लेन-देन करने वाली संस्थाओं को भी अपनी तकनीक और कामकाज बेहतर बनाने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि लोग ऐसी संस्थाओं से जुड़ें और उन्हें मजबूत बनाने में अपना योगदान दें। लेकिन किसी भी संस्था से जुड़ने से पहले उसके कानूनी ढाँचे, काम करने के तरीके और सेवाओं की शर्तों को समझना जरूरी है।

कैसा होना चाहिए फिनटेक का ढाँचा?

यहाँ फिनटेक से मतलब ऐसी वित्तीय तकनीक से है, जिसमें सॉफ्टवेयर की मदद से किसी संस्था के सभी सदस्यों के खाते आपस में जुड़े हों और उन्हें मोबाइल ऐप से इस्तेमाल किया जा सके।

इसके लिए सीबीएस यानी कोर बैंकिंग सॉल्यूशंस जैसी व्यवस्था की जरूरत हो सकती है, जिसके जरिए खातों और लेन-देन का रिकॉर्ड एक जगह से व्यवस्थित किया जा सके। दूसरे बैंकों और कारोबारों के साथ डिजिटल भुगतान और रसीद की सुविधाएँ भी जुड़ी हों।

इसके अलावा, एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित बिजनेस ऐप के कारोबारी आँकड़ों का इस्तेमाल करके ऑनलाइन वित्तीय आवेदन की जाँच की जा सकती है। इसमें कारोबार, आमदनी, खर्च और जोखिम का आकलन किया जाए, ताकि सही जानकारी के आधार पर समय पर फैसले लिए जा सकें।

सदस्यों को अपने डैशबोर्ड पर खातों की मौजूदा हालत, भुगतान और कर्ज से जुड़ी ताजा जानकारी मिलनी चाहिए। संस्था के बोर्ड को भी साफ पता होना चाहिए कि मुनाफे के बँटवारे के लिए कितनी रकम अलग रखी गई है, कितनी रकम सदस्यों को देनी है और कितनी रकम पहले ही दी जा चुकी है।

मुमकिन है कि दुनिया में किसी ने इस तरह का सॉफ्टवेयर पहले ही तैयार कर लिया हो, लेकिन आम लोगों की जरूरतों के मुताबिक उसे तलाशने, समझने और इस्तेमाल करने की जरूरत है। ऐसे फिनटेक के बिना साझेदारी और मुज़ारबत के उसूलों पर वित्तीय संस्था चलाना मुश्किल और जोखिम भरा हो सकता है।

यहाँ यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ सॉफ्टवेयर बना लेने से कोई संस्था अपने आप सूद-मुक्त या शरीयत के मुताबिक नहीं हो जाती। उसके अनुबंध, निवेश का तरीका, मुनाफे और नुकसान का बँटवारा, हिसाब-किताब तथा कानूनी नियमों का पालन भी सही होना चाहिए।

कौमी तरक्की के लिए सबकी शिरकत जरूरी

शिरकत यानी भागीदारी सिर्फ पैसे से नहीं होती। किसी के पास इल्म है, किसी के पास हुनर, किसी के पास वक्त और किसी के पास कारोबार या हिसाब-किताब का तजुर्बा है। एक व्यक्ति जरूरतमंद की सही जरूरत पहचान सकता है, दूसरा रिकॉर्ड बेहतर बना सकता है और तीसरा अपनी हैसियत के मुताबिक पूँजी लगा सकता है।

इसी तरह की जिम्मेदार भागीदारी से संस्थाएँ मजबूत बनती हैं। सवाल यह है कि क्या हम कुरआन और सुन्नत के उसूलों की रोशनी में इतिहास से सबक लेकर आज के दौर के लिए जरूरी फिनटेक तैयार करने की फिक्र कर रहे हैं?

अगर हाँ, तो हमें अपने हिस्से का योगदान भी सुनिश्चित करना चाहिए। कौम की जरूरतें सिर्फ संस्थाओं के संस्थापकों, जिम्मेदार लोगों या कर्मचारियों के भरोसे पूरी नहीं हो सकतीं। जब तक आम लोग साथ नहीं देंगे, कौमी संस्थाएँ मजबूत और असरदार नहीं बन पाएँगी।

कुरआन हमें अपनी क्षमता के मुताबिक तकवा अपनाने, अल्लाह का हुक्म मानने और खर्च करने की रहनुमाई देता है। वह उन लोगों के लिए कामयाबी की खुशखबरी भी देता है, जो अपने दिल की तंगदिली से बचते हैं। अल्लाह हमें यह भी याद दिलाता है कि हर इंसान देखे कि उसने आने वाले कल के लिए क्या भेजा है। (कुरआन 64:16; 59:18)

इसलिए अपनी आखिरत सँवारने के इरादे से अपने इल्म, हुनर, माल और वक्त का कुछ हिस्सा कौम की भलाई के लिए जरूर लगाएँ। माल को आजमाइश इसलिए कहा गया है, क्योंकि उससे जुड़े हमारे फैसले हमारे अखलाक, किरदार और आमाल को जाहिर करते हैं। यही फैसले दुनिया और आखिरत में हमारे अंजाम पर भी असर डालते हैं।

आज जरूरत सिर्फ पैसा जमा करने की नहीं, बल्कि ऐसा भरोसेमंद और पारदर्शी वित्तीय ढाँचा बनाने की है, जो लोगों की बचत की हिफाजत करे, कारोबार को सही तरीके से आगे बढ़ाए और जरूरतमंदों को सूद के बोझ से बचाने में मदद करे। कुरआन और सुन्नत की रोशनी में आधुनिक तकनीक का सही इस्तेमाल इसी दिशा में एक अहम कदम हो सकता है।

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