पर्दाफाश —जम्मू-कश्मीर में लापता महिलाओं और लड़कियों का दर्दनाक सच, RTI ने खोला राज

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(रईस खान )

कश्मीर से एक खबर आई है जो दिल को हिला देने वाली है। जम्मू-कश्मीर में 2019 से 2026 के बीच कुल 16,397 महिलाएं और लड़कियां लापता दर्ज हुईं। इनमें से 4,271 का अब तक कोई पता नहीं चल पाया। यानी हर चार में से एक से ज्यादा का सुराग ही नहीं मिला। ये आंकड़े अंग्रेजी अखबार द ट्रिब्यून ने जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग से सूचना के अधिकार के जरिए हासिल किए हैं। दैनिक ट्रिब्यून, द वायर और कई अन्य जगहों पर भी ये रिपोर्ट छापी गई है।

सोचो जरा। सात साल में इतनी बड़ी संख्या। 12,126 का तो पता लग गया, लेकिन 26 प्रतिशत से ज्यादा मामले अभी भी अनसुलझे पड़े हैं। ये सिर्फ आंकड़े नहीं, हजारों परिवारों की रातों की नींद उड़ाने वाली सच्चाई है।

आंकड़े और भी डरावने हैं जब अलग-अलग देखो

RTI से मिले आंकड़ों के मुताबिक:

– 18 साल से ऊपर की बालिग महिलाएं: 2019 से जून 2026 तक 14,593 लापता हुईं। इनमें से 11,338 का पता लगा, लेकिन 3,255 अभी भी लापता हैं।

– नाबालिग लड़कियां: 2019 से अगस्त 2026 तक 1,804 लापता। सिर्फ 788 का पता चला, बाकी 1,016 का कोई सुराग नहीं। यानी आधे से ज्यादा नाबालिग लड़कियों के मामले अभी भी खुले हैं।

साल-दर-साल देखें तो 2019 में बालिग महिलाओं की संख्या 1,388 थी, 2020 में 1,398। फिर बढ़ती गई, 2021 में 1,854, 2022 में थोड़ी कम 1,766, फिर 2023 में 2,242। 2025 सबसे खराब साल रहा। उस साल अकेले 2,595 बालिग महिलाएं लापता दर्ज हुईं, जिनमें से सैकड़ों का अभी भी पता नहीं।

नाबालिगों के मामले में भी तस्वीर अच्छी नहीं। आधे से ज्यादा केस अनसुलझे रहना वाकई चिंता की बात है। परिवार वाले सालों तक इंतजार करते रहते हैं, कहीं बेटी लौट आए, कहीं कोई खबर आ जाए। लेकिन कई बार सिर्फ इंतजार ही मिलता है।

5 अगस्त 2019 के बाद का माहौल

याद है 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा खत्म किया गया था। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत इसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया। अधिनियम की धारा 28 के मुताबिक विधानसभा कई विषयों पर कानून बना सकती है, लेकिन ‘लोक व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। यानी पुलिस और कानून-व्यवस्था सीधे केंद्र और उपराज्यपाल के अधीन है।

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट में भी यही बात कही गई है कि RTI गृह विभाग से मांगी गई थी, जो अब केंद्रशासित प्रदेश के ढांचे में काम करता है। पुलिसिंग की जिम्मेदारी भी उसी व्यवस्था के तहत है। ऐसे में जब इतने केस अनसुलझे रह जाएं, तो सवाल उठना लाजमी है, जांच कितनी तेजी से और कितनी गंभीरता से हो रही है?

क्या कहते हैं ये आंकड़े?

लापता होना कई वजहों से हो सकता है, घर से भागना, प्रेम विवाद, परिवार के दबाव, तस्करी, या और गंभीर अपराध। लेकिन जब इतनी बड़ी संख्या में नाबालिग लड़कियां शामिल हों और आधे से ज्यादा का पता न चले, तो सिर्फ “घर से भाग गई” कहकर बात खत्म नहीं की जा सकती। परिवार वाले बार-बार पुलिस थाने जाते हैं, RTI लगाते हैं, मीडिया में अपनी बात रखते हैं, लेकिन कई मामलों में फाइलें ठंडी पड़ जाती हैं।

पहले भी संसद में गृह मंत्रालय के आंकड़े आए थे कि 2019-2021 के बीच करीब 9,765 महिलाएं और लड़कियां लापता हुई थीं। अब सात साल का आंकड़ा 16 हजार से ऊपर पहुंच गया है। ये ट्रेंड बढ़ने वाला है या रुकने वाला, ये देखना बाकी है।

परिवारों का दर्द और सिस्टम की जिम्मेदारी

एक मां या बाप के लिए अपनी बेटी का लापता होना कितना बड़ा सदमा होता है, ये शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। कई परिवार सालों से इंतजार कर रहे हैं। कुछ मामलों में लड़कियां दूसरे राज्यों में मिलती हैं, कुछ में वापस घर लौट आती हैं, लेकिन हजारों के बारे में कोई खबर ही नहीं।

सरकार और पुलिस का कहना हो सकता है कि कई मामलों में लड़कियां खुद घर छोड़कर चली जाती हैं या परिवार के झगड़ों की वजह से गायब होती हैं। लेकिन जब 26 प्रतिशत से ज्यादा केस अनसुलझे रह जाएं, खासकर नाबालिगों के, तो जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठना चाहिए। जिलावार आंकड़े भी RTI में मांगे गए थे, लेकिन विस्तार से सार्वजनिक रूप से ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई।

महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है। इसमें जमीनी स्तर पर तेज जांच, परिवारों से नियमित संपर्क, क्रॉस-स्टेट कोऑर्डिनेशन और पारदर्शिता जरूरी है। RTI जैसे औजारों से सच्चाई सामने आती है, लेकिन उसके बाद कार्रवाई भी होनी चाहिए।

ये सिर्फ जम्मू-कश्मीर की कहानी नहीं। पूरे देश में लापता महिलाओं के आंकड़े चिंताजनक हैं। लेकिन यहां 2019 के बाद के बदलाव और पुलिस व्यवस्था के केंद्र के अधीन होने के बाद भी इतने अनसुलझे मामले रह जाना खास तौर पर ध्यान खींचता है।

अंत में एक बात साफ है, इन 4,271 महिलाओं और लड़कियों का सुराग लगना चाहिए। परिवारों को जवाब मिलना चाहिए। आंकड़े सिर्फ कागज पर न रह जाएं, बल्कि असली कार्रवाई में बदलें। वरना ये सिर्फ एक और रिपोर्ट बनकर रह जाएगी, और हजारों परिवार अंधेरे में इंतजार करते रहेंगे।

–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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