संजय राउत की किताब ‘बोध कीर्तन’ का विमोचन, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की मौजूदगी ने बनाया खास
-शिब्ली रामपुरी
राजनीति की भागदौड़ के बीच जब बात साहित्य, दर्शन और जिंदगी के अनुभवों की हो, तो माहौल कुछ अलग हो जाता है। मुंबई के दादर इलाके में शनिवार को ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला, जब शिवसेना (यूबीटी) के नेता, सांसद और मराठी अखबार ‘सामना’ के कार्यकारी संपादक संजय राउत की नई किताब ‘बोध कीर्तन’ का विमोचन किया गया। इस मौके पर शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे और वरिष्ठ पत्रकार-लेखक अंबरीश मिश्र मौजूद रहे।
दादर पश्चिम में छत्रपति शिवाजी महाराज पार्क के पास स्थित ब्राह्मण सहायक संघ में शाम पांच बजे आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्य और राजनीति का अनोखा मेल देखने को मिला। मेहता पब्लिशिंग हाउस और ‘सामना’ की ओर से आयोजित समारोह में किताब, लेखन और जिंदगी के अनुभवों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम की जगह शिवसेना भवन के ठीक सामने होने के कारण इसका राजनीतिक महत्व भी नजर आया।
17वीं किताब में जिंदगी के कई रंग
‘बोध कीर्तन’ संजय राउत की 17वीं किताब बताई जा रही है। यह किताब सिर्फ राजनीतिक घटनाओं या भाषणों तक सीमित नहीं है। इसमें उनके निजी अनुभव, लोगों से मुलाकातें, पढ़े हुए लेख, विचार, कविताएं, पत्र, छोटी कहानियां और मन की बातें शामिल हैं।
किताब में जिंदगी को देखने और समझने के अलग-अलग नजरिए सामने आते हैं। इंसान अपने आसपास की दुनिया से क्या सीखता है, लोगों से मिलने पर उसके विचार कैसे बदलते हैं और साहित्य किस तरह जीवन को समझने में मदद करता है, इन पहलुओं की झलक इसमें देखने को मिलती है।
संजय राउत को आम तौर पर राजनीतिक बयानों और अपनी बेबाक बातों के लिए जाना जाता है। ऐसे में उनकी इस किताब को उनके व्यक्तित्व के एक दूसरे पहलू को समझने का मौका भी माना जा सकता है।
कला, दर्शन और साहित्य की बात
समारोह में वक्ताओं ने कला, दर्शन और साहित्य के रिश्ते पर अपने विचार रखे। इस दौरान यह बात सामने आई कि कला और दर्शन किसी भी समाज की संस्कृति को समझने के दो अहम रास्ते हैं। दर्शन जिंदगी और दुनिया से जुड़े मुश्किल सवालों पर सोचने का मौका देता है, लेकिन उसकी भाषा कई बार आम लोगों के लिए कठिन हो जाती है।
यहीं साहित्य और कविता की भूमिका सामने आती है। एक अच्छा कवि मुश्किल बात को भी आसान शब्दों में कह देता है, जिससे आम इंसान उससे जुड़ पाता है। साहित्य केवल पढ़ने की चीज नहीं, बल्कि जिंदगी को समझने और अपने विचारों को बेहतर बनाने का जरिया भी है।
लेखक की मेहनत भी पत्थर तोड़ने जैसी
कार्यक्रम में लेखकों की मेहनत को रोजगार गारंटी योजना में पत्थर तोड़ने वाले मजदूरों से जोड़कर समझाया गया। यह तुलना अपने आप में दिलचस्प थी। जिस तरह मजदूर लगातार मेहनत करके पत्थर तोड़ता है और कभी-कभी उसी पत्थर में कोई कीमती चीज मिल जाती है, उसी तरह लेखक भी लगातार लिखता रहता है।
हजारों-लाखों लोगों के लिखने के बावजूद बहुत कम लेखकों की रचनाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें लंबे समय तक याद रखा जाता है। कालिदास, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और दोस्तोयेव्स्की जैसे नाम साहित्य की दुनिया में ऐसे ही अनमोल उदाहरण हैं।
इस विचार का मतलब यह है कि लेखन में पहचान और सफलता आसानी से नहीं मिलती। इसके पीछे लंबे समय की मेहनत, अनुभव, अध्ययन और लगातार कुछ नया कहने की कोशिश होती है। हर लेखक का काम जरूरी है, भले ही हर किसी को बड़ी पहचान न मिले।
विजय माल्या और प्रधानमंत्री मोदी पर भी चर्चा
‘बोध कीर्तन’ विमोचन से पहले ही चर्चा में आ गई थी। इसकी एक वजह किताब में कारोबारी विजय माल्या को लेकर संजय राउत के विचार हैं। राउत ने लिखा है कि माल्या को धोखेबाज कहना सही नहीं है। उनके मुताबिक, माल्या के कारोबार में मुश्किलें आईं और सरकार ने उन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर किया।
किताब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गैर-राजनीतिक भाषणों की तारीफ भी की गई है। इन बातों के कारण किताब को लेकर राजनीतिक हलकों में भी दिलचस्पी पैदा हुई है।
हालांकि, विजय माल्या से जुड़ी बातों को संजय राउत का नजरिया समझना जरूरी है। यह मामला केवल किसी लेखक की राय तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कानूनी और आर्थिक तथ्य भी अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं।
राजनीति से आगे भी है एक दुनिया
संजय राउत की पहचान एक आक्रामक राजनीतिक नेता और टिप्पणीकार की रही है। लेकिन ‘बोध कीर्तन’ के विमोचन ने उनके साहित्यिक पक्ष को सामने लाने का अवसर दिया। कार्यक्रम में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे जैसे प्रमुख राजनीतिक चेहरों की मौजूदगी ने इसे राजनीतिक रूप से भी चर्चा का विषय बनाया, जबकि मंच पर हुई साहित्यिक बातचीत ने इसे एक अलग पहचान दी।
यह आयोजन इस बात की याद दिलाता है कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों की पहचान केवल उनके राजनीतिक बयानों से नहीं बनती। उनके निजी अनुभव, पढ़ने-लिखने की आदतें और समाज को देखने का नजरिया भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा होते हैं।
‘बोध कीर्तन’ इसी नजरिए से संजय राउत के विचारों, अनुभवों और जिंदगी से मिली सीख को जानने का एक अवसर है। किताब पाठकों को कितना प्रभावित करेगी, यह तो उसे पढ़ने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इसके विमोचन ने राजनीति और साहित्य के बीच बातचीत का एक नया मंच जरूर तैयार किया।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

