मसरूर अहमद
कानपुर के चमनगंज की पहचान माने जाने वाले ऐतिहासिक हलीम मुस्लिम पी.जी. कॉलेज की भव्य इमारत आज शिक्षा के उजालों के बजाय आपसी कलह, कानूनी मुकदमों और प्रशासनिक बदहाली के अंधेरे में घिरी है। कभी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की तर्ज पर कौम को आधुनिक शिक्षा देने के सपने के साथ स्थापित हुआ यह संस्थान आज प्रबंधन, मुस्लिम एसोसिएशन कानपुर की अंदरूनी सियासत और करोड़ों की जमीनों के व्यावसायिक खेल का अखाड़ा बन चुका है। इसके खिलाफ पूर्व छात्र और स्थानीय युवा अब सड़कों पर हैं।
बारातशाला बनाम पाठशाला: क्यों भड़के हैं पूर्व छात्र?
मुस्लिम एसोसिएशन के तहत चलने वाले इस इदारे की मौजूदा स्थिति को लेकर पूर्व छात्रों और स्थानीय युवाओं में भारी आक्रोश है। हाल ही में हलीम मुस्लिम ओल्ड बॉयज़ एसोसिएशन और स्थानीय युवाओं ने जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचकर एक व्यापक जांच की मांग का ज्ञापन सौंपा। आंदोलन की अगुवाई कर रहे युवाओं का सीधे तौर पर आरोप है कि कॉलेज की जमीनों का इस्तेमाल शादी-ब्याह और अन्य कमर्शियल गतिविधियों के लिए धड़ल्ले से किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर युवाओं की आवाज बनते हुए स्थानीय छात्र कार्यकर्ता जैस खान कहते हैं,
“कानपुर का हलीम कॉलेज इल्म का इदारा है, कोई बारातशाला नहीं! जहाँ बच्चों को बेहतरीन लाइब्रेरी और खेल के मैदान मिलने चाहिए थे, वहाँ मैनेजमेंट ने इसे कमाई का जरिया बना दिया है। जर्जर इमारतें और घटती छात्र संख्या गवाह हैं कि मुस्लिम समाज को तालीमी तौर पर और पीछे धकेला जा रहा है।”
चार सोसायटियों का झगड़ा और पुलिस का दखल
हलीम कॉलेज का संकट सिर्फ बदहाली तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे करोड़ों की वक्फ और कॉलेज संपत्तियों पर कब्जे की खूनी जंग है। पिछले कुछ वर्षों से मुस्लिम एसोसिएशन पर आधिपत्य जमाने के लिए चार अलग-अलग गुट आमने-सामने हैं। यह मामला इस समय डिप्टी रजिस्ट्रार से लेकर माननीय उच्च न्यायालय के विचाराधीन है।
विवाद इस हद तक बढ़ चुका है कि कॉलेज परिसर में परीक्षाओं और प्रैक्टिकल के दौरान पुलिस फोर्स बुलाई जा रही है। इस प्रशासनिक दखल पर नाराजगी जाहिर करते हुए हलीम मुस्लिम इंग्लिश स्कूल की प्रधानाचार्य सबा खान ने तीखा बयान दिया है,
“मैनेजमेंट के आपसी विवाद का खामियाजा हमारे शिक्षकों और मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। जब स्कूल में बोर्ड के प्रैक्टिकल और एग्जाम चल रहे हों, तब पुलिस को परिसर में घुसा देना किस हद तक जायज है? पिछली प्रबंध समितियों ने प्राचार्यों को इतना प्रताड़ित किया कि उन्हें पीछे के रास्ते से भागना पड़ा। हम अपनी और संस्थान की गरिमा के लिए यह लड़ाई आखिरी दम तक लड़ेंगे।”
भर्ती पर उठते सवाल: क्या सच में हुई अनदेखी?
पूर्व छात्रों का एक बड़ा और गंभीर आरोप कॉलेज में हाल ही में हुई प्रोफेसरों की भर्ती को लेकर भी है। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि एक अल्पसंख्यक संस्थान होने के बावजूद, मैनेजमेंट की अंदरूनी साठगांठ और गुटबाजी के चलते योग्य स्थानीय या मुस्लिम उम्मीदवारों की कद्र नहीं की गई।
हालांकि, जानकारों का कहना है कि छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से संबद्ध इस एडेड कॉलेज में नियुक्तियां राज्य सरकार और यूनिवर्सिटी के कड़े पैनल के जरिए ही संभव हैं। लेकिन स्थानीय समुदाय का मानना है कि यदि मैनेजमेंट मजबूत होता, तो एएमयू की तरह आज हलीम कॉलेज भी रिसर्च और उच्च शिक्षा का एक बड़ा हब होता। फिलहाल, कॉलेज के पूर्व जनरल सेक्रेटरी अब्दुल हसीब और विरोधी गुटों के बीच चल रहे मुकदमों, तोड़फोड़ की घटनाओं और जान से मारने की धमकियों ने शिक्षा के इस मंदिर को पूरी तरह कलंकित कर दिया है।
एसोसिएशन का पलटवार, “आरोप बेबुनियाद और साज़िश का हिस्सा”
इन तमाम आरोपों पर जब मुस्लिम एसोसिएशन के मौजूदा पदाधिकारियों का पक्ष सामने आया, तो उन्होंने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। एसोसिएशन के वर्तमान कर्ता-धर्ताओं का कहना है कि कॉलेज को बदनाम करने के लिए कुछ “निष्कासित” सदस्य और बाहरी तत्व पूर्व छात्रों को मोहरा बना रहे हैं।
प्रबंध समिति के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,
“कॉलेज की जमीनों पर कोई अवैध कब्जा या गलत कमर्शियल इस्तेमाल नहीं हो रहा है। जो भी कार्यक्रम होते हैं, उनसे आने वाली आय को संस्था के रख-रखाव और गरीब बच्चों की फीस में ही लगाया जाता है। प्रोफेसरों की भर्ती पूरी तरह यूनिवर्सिटी गाइडलाइंस और पारदर्शिता के साथ हुई है। कुछ लोग सिर्फ वक्फ और कॉलेज की करोड़ों की कीमती संपत्तियों पर अपना निजी मालिकाना हक जमाने के लिए एसोसिएशन के खिलाफ झूठी अफवाहें फैला रहे हैं।”
प्रशासनिक जांच की प्रोग्रेस रिपोर्ट: असंतोष और पुनः जांच की मांग
अक्टूबर 2026 के ताजा घटनाक्रम के मुताबिक, जिला प्रशासन द्वारा गठित की गई जांच समिति ने हलीम डिग्री कॉलेज की वित्तीय और प्रशासनिक गड़बड़ियों को लेकर अपनी शुरुआती रिपोर्ट तैयार कर ली है। हालांकि, इस जांच रिपोर्ट के आते ही नया विवाद खड़ा हो गया है।
हलीम मुस्लिम ओल्ड बॉयज़ एसोसिएशन 2019 ने प्रशासन की इस आरंभिक जांच पर कड़ी आपत्ति जताई है। पूर्व छात्र नेताओं का आरोप है कि जांच अधिकारियों ने कुछ रसूखदार पदाधिकारियों को बचाने के लिए मुख्य मुद्दों , जैसे- गुप्त वित्तीय लेनदेन, प्रोफेसरों की भर्ती में कथित धांधली और अवैध शादियों से हुई कमाई का ब्योरा, को रिपोर्ट में सही तरीके से शामिल नहीं किया है। पूर्व छात्रों ने इस रिपोर्ट के खिलाफ प्रशासन को लिखित आपत्ति भेजकर निष्पक्ष अधिकारियों से ‘पुनः जांच’ कराने की आधिकारिक मांग की है।
प्रशासनिक स्तर पर मामले को शांत कराने के लिए जिलाधिकारी और शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी दोनों पक्षों को एक मेज पर बिठाकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में हैं, ताकि कॉलेज के शैक्षणिक सत्र पर असर न पड़े। लेकिन कानपुर के लोगों का सवाल यही है, विवादों की इस दलदल में फंसा हलीम कॉलेज क्या अपनी खोई हुई तालीमी विरासत कभी वापस पा सकेगा?
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

