पंजाब के जखवाली गांव ने पेश की कौमी यकजहती की बेमिसाल नजीर
इंसानियत और मोहब्बत का अनूठा सजदा
-अहद सज्जाद
आज जहां दुनिया में नफरत और दूरियों की बातें अक्सर सुर्खियां बनती हैं, वहीं पंजाब की सरजमीं ने एक बार फिर पूरी इंसानियत को मोहब्बत और कौमी यकजहती का रास्ता दिखाया है. पंजाब के ऐतिहासिक जिले फतेहगढ़ साहिब के जखवाली गांव से एक ऐसी दिल को छू लेने वाली दास्तान सामने आई है, जिसने गंगा-जमुनी तहजीब को अमली जामा पहना दिया है. गांव की एक ७५ साला बुजुर्ग सिख महिला, बीबी राजिंदर कौर ने दरियादिली और मजहबी रवादारी की वह मिसाल कायम की है, जिसकी गूंज पूरे मुल्क में सुनाई दे रही है.
तीन दहाइयों का इंतजार और ५ मरले जमीन का तोहफा
जखवाली गांव में करीब १०० मुस्लिम घराने आबाद हैं. गांव में गुरुद्वारा और शिव मंदिर तो मौजूद थे, लेकिन कोई मस्जिद नहीं थी. इस वजह से यहां के मुस्लिम भाइयों को रोजाना की नमाज और जुमे की जमात के लिए करीब २ किलोमीटर दूर मुल्लांपुर गांव जाना पड़ता था. पिछले ३० बरसों से गांव की मुस्लिम बिरादरी अपने लिए इबादतगाह की जमीन तलाश रही थी. सरकारी नियमों के मुताबिक सार्वजनिक या पंचायती जमीन पर मजहबी तामीरात की इजाजत नहीं थी, जिससे यह मामला सालों से लटका हुआ था.
जब बीबी राजिंदर कौर को अपने पड़ोसी मुस्लिम भाइयों की इस तकलीफ का अहसास हुआ, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने अपने परिवार और पोते सतनाम सिंह की मर्जी से अपनी निजी मलकियत की ५ मरला जमीन (तकरीबन १,३६० स्क्वायर फीट) गांव की मस्जिद कमेटी के नाम कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड करवा दी. बीबी राजिंदर कौर का कहना है, “हमारे मुस्लिम भाइयों के पास इबादत के लिए कोई जगह नहीं थी, उन्हें दूर जाना पड़ता था। किसी को खुदा की इबादत के लिए जगह देना सबसे बड़ा नेक काम है। उनकी खुशी में ही हमारी खुशी है।”
हिंदू-सिख भाइयों ने पेश की खिदमत-ए-खल्क की मिसाल
बीबी राजिंदर कौर के इस नेक कदम ने पूरे गांव के जज्बात को जगा दिया. जैसे ही जमीन का मसला हल हुआ, गांव के सिख और हिंदू पड़ोसियों ने इसे सिर्फ मुसलमानों का काम नहीं समझा, बल्कि पूरे गांव का साझा प्रोजेक्ट बना लिया. आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करते हुए गैर-मुस्लिम परिवारों ने मस्जिद की तामीर के लिए चंदा इकट्ठा करना शुरू किया और देखते ही देखते ३.५ लाख रुपये से ज्यादा की रकम जमा कर दी.
शाही इमाम ने रखी बुनियाद
इस ऐतिहासिक लम्हे को यादगार बनाने के लिए ७ दिसंबर २०२५ को पंजाब के शाही इमाम, मौलाना मुहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी ने जखवाली गांव का दौरा किया और अपने मुकद्दस हाथों से मस्जिद का संगे-बुनियाद रखा. इस मौके पर शाही इमाम ने कहा कि पंजाब की यह रिवायत उन ताकतों को करारा जवाब है जो समाज में ध्रुवीकरण फैलाना चाहती हैं। गांव के गुरुद्वारे और मंदिर की तरह अब यह मस्जिद भी गांव की साझी विरासत का हिस्सा बन चुकी है.
नफरत के दौर में मोहब्बत का पैगाम
जखवाली गांव ने यह साबित कर दिया है कि भले ही हमारे पूजने के तौर-तरीके और मजहब अलग हों, लेकिन जब बात इंसानियत, मोहब्बत और एक-दूसरे के सम्मान की आती है, तो भारत का दिल एक साथ धड़कता है. यह फीचर लेख हमें याद दिलाता है कि जब तक बीबी राजिंदर कौर जैसी माएं और जखवाली जैसे जागरूक गांव इस मुल्क में मौजूद हैं, तब तक हमारी साझी संस्कृति और आपसी भाईचारे की बुनियाद को कोई हिला नहीं सकता.
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

