बांगरमऊ के कटिघरा में डिफेंस कॉरिडोर की तैयारी, औद्योगिक विकास की नई उम्मीद

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भूमि सर्वे पूरा, रक्षा उद्योगों के लिए क्षेत्र विकसित होने से रोजगार और कारोबार के नए अवसर खुलने की संभावना

–रईस खान 

उत्तर प्रदेश का उन्नाव जिला इन दिनों एक बड़े औद्योगिक और प्रशासनिक बदलाव का केंद्र बना हुआ है। बांगरमऊ तहसील के कठिघरा और उसके आसपास के इलाकों में राज्य सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई है। सरकार की योजना यहां उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का 7वां नोड स्थापित करने की है। जहाँ एक तरफ प्रशासन इसे इलाके की तकदीर बदलने वाला मेगा प्रोजेक्ट बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ अपनी उपजाऊ जमीन खोने के डर से स्थानीय किसानों में गहरी चिंता है।

आइए डिजिटल मीडिया के इस विशेष विश्लेषण में समझते हैं कि यह पूरा प्रोजेक्ट क्या है, इसका सरकारी रोडमैप क्या है और इसके सामाजिक-आर्थिक पहलू क्या हैं।

सामरिक और आर्थिक एंगल, क्यों चुनी गई बांगरमऊ की यह जमीन?

डिफेंस कॉरिडोर के लिए बांगरमऊ के कटिघरा क्षेत्र को चुनने के पीछे सरकार की एक सोची-समझी रणनीति है:

• एक्सप्रेसवे से सीधी कनेक्टिविटी: यह इलाका गंगा एक्सप्रेसवे और लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के बेहद करीब है, जिससे भारी सैन्य उपकरणों और कच्चे माल के परिवहन में आसानी होगी।

• डिफेंस हब का निर्माण: उन्नाव को देश के 7वें डिफेंस नोड के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ भारतीय सेना और निर्यात के लिए अत्याधुनिक मिलिट्री-ग्रेड ड्रोन, हथियार, गोला-बारूद, मशीन गन और बुलेटप्रूफ जैकेट बनाने वाले उद्योग लगाए जाएंगे।

• रोजगार की उम्मीदें: सरकार का दावा है कि इस परियोजना से पूरे अवध और कानपुर मंडल के युवाओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

किसान एंगल, उपजाऊ भूमि बनाम विकास की बहस

प्रोजेक्ट का दूसरा पहलू उन अन्नदाताओं से जुड़ा है जिनकी जमीनें इस कॉरिडोर के दायरे में आ रही हैं:

• 800 बीघा जमीन का अधिग्रहण: बांगरमऊ-कटिघरा मुख्य मार्ग पर स्थित करीब 800 बीघा कृषि भूमि को इस परियोजना के लिए चिन्हित किया गया है।

• प्रभावित होने वाले गांव: इस फैसले से ग्राम कटिघरा, अहमदाबाद सेन नगर, टांडा सातन, लंभुई और गाजीखेड़ा के लगभग 350 किसान परिवार सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं।

• किसानों का विरोध क्यों? स्थानीय किसानों का तर्क है कि सरकार बंजर या कम उपजाऊ भूमि लेने के बजाय उनकी अत्यधिक उपजाऊ और बहु-फसली जमीन का अधिग्रहण कर रही है। किसानों का कहना है कि यह जमीन उनकी आजीविका का एकमात्र सहारा है। इसी सिलसिले में पीड़ित किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल हाल ही में विपक्षी नेताओं से मिलकर मुआवजे और जमीन बचाने की गुहार भी लगा चुका है।

चार चरणों का रोडमैप: कैसे जमीन पर उतरेगा यह मेगा प्रोजेक्ट?

उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन इस पूरे कॉरिडोर को 4 व्यवस्थित स्टेप्स में विकसित कर रहे हैं:

1. पहला स्टेप: तकनीकी सर्वे और चिह्नांकन 

सबसे पहले रक्षा मंत्रालय और तकनीकी विशेषज्ञों की टीमों द्वारा भूमि का भौतिक और तकनीकी निरीक्षण किया जाता है। इसमें जमीन के ऊपर से गुजरने वाली हाईटेंशन बिजली लाइनों, जल स्रोतों और वन विभाग की अनापत्ति की जांच शामिल है। कटिघरा और मुर्तजा नगर जैसे इलाकों में प्राथमिक चिह्नांकन का काम पूरा किया जा चुका है।

2. दूसरा स्टेप: भूमि अधिग्रहण और मुआवजा 

यह वर्तमान में चल रहा सबसे संवेदनशील चरण है। सरकार करीब 700 एकड़ मुख्य डिफेंस नोड और 200 एकड़ इंडस्ट्रियल क्लस्टर के लिए जमीनों का लीगल अधिग्रहण कर रही है। प्रशासन का दावा है कि किसानों को सर्किल रेट के आधार पर उचित मुआवजा तय समय के भीतर सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।

3. तीसरा स्टेप: ‘प्लग-एंड-प्ले’ इंफ्रास्ट्रक्चर 

जमीन मिलते ही सरकार इस क्षेत्र को उद्योगों के अनुकूल बनाने के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करेगी। इसके तहत 4-लेन की लिंक सड़कें, निर्बाध बिजली आपूर्ति, आधुनिक सीवर लाइनों के साथ वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाएंगे। इसे सीधे एक्सप्रेसवे जंक्शनों से जोड़ा जाएगा ताकि कंपनियों को फैक्ट्री लगाने में कोई परेशानी न हो।

4. चौथा स्टेप: कंपनियों का आगमन और उत्पादन 

अंतिम चरण में सरकार देश और दुनिया की बड़ी रक्षा उत्पादक कंपनियों के साथ एमओयू साइन कर उन्हें प्लॉट आवंटित करेगी। बड़ी कंपनियों के साथ-साथ सूक्ष्म और लघु उद्योगों को भी यहाँ जगह मिलेगी ताकि एक लोकल सप्लाई चेन विकसित की जा सके। इसके बाद रक्षा उपकरणों का वास्तविक उत्पादन शुरू होगा।

कब तक पूरा होगा काम?

प्रशासन ने सर्वे और प्राथमिक भूमि अधिग्रहण की कागजी कार्रवाई को वर्ष 2026 के मध्य तक तेजी से पूरा करने का लक्ष्य रखा है। चूंकि यह एक विशाल और आधुनिक रक्षा गलियारा है, इसलिए सड़कों के निर्माण, बुनियादी ढांचे के विकास और कंपनियों द्वारा फैक्ट्रियां लगाकर पूर्ण रूप से उत्पादन शुरू करने में अगले 3 से 5 साल, अनुमानित वर्ष 2029 से 2031 के बीच, का समय चरणबद्ध तरीके से लग सकता है।

संतुलन की जरूरत

बांगरमऊ का यह डिफेंस कॉरिडोर उत्तर प्रदेश को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, इस औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ स्थानीय किसानों के हितों की रक्षा करना, उन्हें भूमि का सही बाजार मूल्य दिलाना और विस्थापित होने वाले परिवारों के पुनर्वास को सुनिश्चित करना भी शासन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। विकास और जन-आकांक्षाओं के बीच का यह संतुलन ही इस परियोजना की वास्तविक सफलता तय करेगा।

–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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