खिराज ए अकीदत -शम्स देवबंदी: 45 साल तक मुशायरों में महकती रही शायरी की खुशबू, अदब का एक पुराना चेहरा खामोश हो गया

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देवबंद के मशहूर शायर शम्सुद्दीन खान का इंतकाल, अदबी दुनिया में गम की लहर; नई पीढ़ी के शायरों की हौसला अफजाई और तरबियत में भी रहा अहम किरदार

-शिब्ली रामपुरी

उर्दू शायरी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले मशहूर शायर शम्सुद्दीन खान, जिन्हें अदबी दुनिया में शम्स देवबंदी के नाम से जाना जाता था, अब हमारे बीच नहीं रहे। 31 अक्टूबर 2026 को देवबंद में उनका इंतकाल हो गया। उनके जाने से न सिर्फ देवबंद की अदबी महफिलों में एक खालीपन पैदा हुआ है, बल्कि मुशायरों की दुनिया ने भी एक ऐसे शायर को खो दिया है, जिसने अपनी जिंदगी के करीब 45 साल उर्दू शायरी और अदब की खिदमत में गुजारे।

उनके इंतकाल की खबर से देवबंद के साहित्यिक हलकों, शायरों, दोस्तों और चाहने वालों में गम का माहौल है। वह ऐसे शायर थे, जिनकी पहचान सिर्फ अपने कलाम तक सीमित नहीं थी। वह नए शायरों की हौसला अफजाई करते, उन्हें अपनी शायरी सुनाने का मौका देते और अदब की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए उनकी रहनुमाई भी करते थे।

देवबंद की मिट्टी में जन्मा शायरी का सफर

शम्स देवबंदी का जन्म 1 जुलाई 1964 को देवबंद में हुआ था। उनके वालिद का नाम शोकत भट्टे था, जो देवबंद की जानी-पहचानी शख्सियतों में शुमार थे। बचपन से ही शम्स को उर्दू जबान और अदब से गहरा लगाव था। यही लगाव धीरे-धीरे शायरी के शौक में बदला और फिर उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया।

शायरी उनके लिए केवल अपने जज्बात को अल्फाज देने का जरिया नहीं थी, बल्कि वह इसे अपनी जिंदगी का एक मकसद मानते थे। उन्होंने कम उम्र में ही अदबी सरगर्मियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। साल 1981 में उन्होंने देवबंद में ‘अंजुमन बज्म-ए-सुखन’ की बुनियाद रखी। यह उनके अदबी सफर का एक अहम कदम था।

उस दौर में छोटे शहरों और कस्बों में शायरी की महफिलें सजाना और नए लोगों को अदब से जोड़ना आसान काम नहीं था। लेकिन शम्स देवबंदी ने इस काम को पूरी दिलचस्पी और लगन के साथ आगे बढ़ाया। उनकी कोशिशों से देवबंद में शायरी और मुशायरों की एक ऐसी फिजा तैयार हुई, जिसमें नए शायरों को अपनी बात कहने का मौका मिलने लगा।

45 साल का अदबी सफर

शम्स देवबंदी का शायरी का सफर 1981 से 2026 तक लगातार जारी रहा। यानी उन्होंने अपनी जिंदगी के करीब 45 साल उर्दू शायरी को दिए।

इस लंबे सफर में उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले मुशायरों में शिरकत की और देवबंद की अदबी पहचान को आगे बढ़ाया। उनकी शायरी में रूहानियत, मोहब्बत, इंसानी जज्बात और जिंदगी के अलग-अलग रंग देखने को मिलते थे।

उनका अंदाज ऐसा था कि वह आम सुनने वालों से भी आसानी से जुड़ जाते थे। यही वजह थी कि मुशायरों में उनकी मौजूदगी को पसंद किया जाता था। वह शायरी को मुश्किल अल्फाज और भारी-भरकम अंदाज तक सीमित रखने के बजाय दिल की बात को असरदार तरीके से पेश करने में यकीन रखते थे।

उस्ताद शायर से ली इस्लाह, प्रकाशित हुआ पहला मजमूआ

शम्स देवबंदी ने अपने शायरी के सफर को बेहतर बनाने के लिए मशहूर शायर और गीतकार मरहूम ताजदार ताज, मुंबई से लंबे समय तक इस्लाह ली। उर्दू शायरी में इस्लाह का मतलब किसी उस्ताद शायर की रहनुमाई में अपने कलाम की भाषा, बहर, लय और शायरी के फन को बेहतर बनाना होता है।

ताजदार ताज की रहनुमाई ने उनके शायरी के सफर को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

साल 2010 में उनका शायरी संग्रह ‘तेरी रहगुजर से आगे’ प्रकाशित हुआ। इस किताब की छपाई और प्रकाशन में भी ताजदार ताज ने सहयोग किया था। 3 नवंबर 2010 को जामिया तिब्बिया देवबंद में इस किताब का विमोचन हुआ था।

यह किताब उनके लंबे अदबी सफर की एक अहम निशानी है। किसी शायर के लिए अपना कलाम किताब की शक्ल में पाठकों तक पहुंचाना एक खास अनुभव होता है। इस संग्रह के जरिए शम्स देवबंदी की शायरी को मुशायरों के श्रोताओं के साथ-साथ पढ़ने वाले लोगों तक भी पहुंचने का मौका मिला।

शायरी के साथ नए शायरों की हौसला अफजाई

शम्स देवबंदी की एक खास पहचान यह भी थी कि वह अपने आसपास शायरी करने वाले नए लोगों को आगे बढ़ाने की कोशिश करते थे।

देवबंद के शायर जकी अंजुम सिद्दीकी ने उनके इंतकाल पर अपने पुराने रिश्ते को याद करते हुए बताया कि शम्स देवबंदी उनके पुराने दोस्त, रहनुमा, हमदर्द और हौसला बढ़ाने वाले थे।

उन्होंने बताया कि जब उन्होंने शायरी की शुरुआत की थी, तब शम्स देवबंदी ने उन्हें काफी हौसला दिया। उनकी पहली अदबी बैठक भी शम्स देवबंदी के घर पर हुई थी। शायरी के शुरुआती दिनों में उन्होंने उन्हें कई उपयोगी मशवरे दिए, जिनसे उन्हें आगे बढ़ने में मदद मिली।

जकी अंजुम सिद्दीकी ने उनका एक शेर भी याद किया:

करीब आ तेरी आंखों में देख लूं खुद को,
बहुत दिनों से कोई आईना नहीं देखा।

यह शेर उनकी शायरी में मौजूद मोहब्बत और एहसास की गहराई को सामने लाता है।

एक शायर के लिए यह बड़ी बात होती है कि वह अपनी शायरी के साथ-साथ दूसरे लोगों को भी इस फन से जोड़ने का काम करे। शम्स देवबंदी ने अपनी जिंदगी में इस जिम्मेदारी को भी निभाया।

मुस्लिम फंड ट्रस्ट से भी जुड़ा रहा रिश्ता

शम्स देवबंदी लंबे समय से मुस्लिम फंड ट्रस्ट देवबंद से जुड़े हुए थे और वहां अपनी सेवाएं दे रहे थे। इस तरह उनकी जिंदगी का एक हिस्सा सामाजिक और संस्थागत जिम्मेदारियों में भी गुजरा।

वह अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के साथ शायरी के लिए भी वक्त निकालते थे। अदबी महफिलों में उनकी सक्रियता इस बात का सबूत थी कि शायरी उनके लिए केवल वक्त गुजारने का शौक नहीं, बल्कि जिंदगी से जुड़ा एक अहम रिश्ता थी।

देवबंद में उनकी पहचान एक शायर, अदबी शख्सियत और नए लोगों को आगे बढ़ाने वाले इंसान के तौर पर थी।

मुशायरों में देवबंद की नुमाइंदगी

शम्स देवबंदी ने बड़ी तादाद में मुशायरों में हिस्सा लिया और देवबंद की अदबी पहचान को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाया। उन्हें उनकी अदबी खिदमात के लिए कई सम्मान और एवार्ड भी मिले।

देवबंद का नाम आमतौर पर दीनी तालीम और इल्मी पहचान के लिए जाना जाता है, लेकिन इस शहर की एक मजबूत अदबी और शायरी की परंपरा भी रही है। शम्स देवबंदी इसी परंपरा से जुड़े हुए थे।

उन्होंने अपनी शायरी और अदबी गतिविधियों के जरिए इस परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। उनकी कोशिशों का एक अहम पहलू यह था कि वह अपने शहर के नए शायरों को भी बड़े अदबी मंचों तक पहुंचते देखना चाहते थे।

उनके जाने से सूनी हुई अदबी महफिल

उनके इंतकाल की खबर के बाद देवबंद में होने वाली एक अदबी बैठक भी गम के माहौल में स्थगित कर दी गई। उर्दू महल देवबंद की ओर से 31 अक्टूबर को एक बैठक आयोजित की जानी थी, लेकिन शम्स देवबंदी के इंतकाल के कारण इसे टाल दिया गया।

मुस्लिम फंड ट्रस्ट देवबंद के मैनेजर, डिप्टी मैनेजर और दूसरे कर्मचारियों ने भी उनके इंतकाल पर गहरे दुख का इजहार किया। उनके सहयोगियों और जानने वालों ने परिवार से मिलकर अपनी संवेदनाएं जाहिर कीं।

शायर जकी अंजुम सिद्दीकी के अलावा डॉ. काशिफ, वली वकास, मोहम्मद नवीद कासमी, हाजी कमाल असगर और फहीम अख्तर सिद्दीकी सहित कई लोगों ने उनके इंतकाल पर दुख जाहिर किया।

कलाम रहेगा जिंदा

शम्स देवबंदी की जिंदगी इस बात की मिसाल है कि साहित्य और शायरी से जुड़ा इंसान अपनी रचनाओं के अलावा अपने व्यवहार, रहनुमाई और लोगों को जोड़ने की कोशिशों से भी अपनी पहचान बनाता है।

उन्होंने करीब 45 साल तक शायरी की, मुशायरों में देवबंद की नुमाइंदगी की, अपना शायरी संग्रह प्रकाशित कराया और नए शायरों को आगे बढ़ने का हौसला दिया।

आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका कलाम, उनकी अदबी कोशिशें और उनसे जुड़े लोगों की यादें बाकी रहेंगी। उनकी शायरी पढ़ी और सुनी जाती रहेगी और आने वाली नस्लों को भी उनके अदबी सफर से परिचित होने का मौका मिलता रहेगा।

एक शायर की असल जिंदगी उसके जाने के बाद भी उसके अल्फाज में बाकी रहती है। शम्स देवबंदी के साथ भी यही होगा।

अल्लाह उन्हें मगफिरत फरमाए और उनके अहल-ए-खाना, दोस्तों और चाहने वालों को सब्र अता करे। आमीन।

-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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