अमेरिका के इतिहास में पहली बार मुस्लिम सीनेटर, मिशिगन से अब्दुल एल-सैयद ने रचा इतिहास

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रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स को हराया; चुनाव प्रचार के दौरान इस्लामोफ़ोबिया और ग़ज़ा का मुद्दा भी बना चर्चा का केंद्र

-एडविन एल्ड्रिन

वॉशिंगटन। अमेरिका की राजनीति में एक नया इतिहास दर्ज हुआ है। मिशिगन से डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल एल-सैयद ने अमेरिकी सीनेट का चुनाव जीत लिया है। मीडिया के चुनावी अनुमानों के मुताबिक, उनकी जीत के साथ वह अमेरिकी इतिहास में सीनेटर चुने जाने वाले पहले मुस्लिम बन गए हैं। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार माइक रोजर्स को शिकस्त दी। उनकी इस कामयाबी को अमेरिकी मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

4 नवंबर को सामने आए चुनावी नतीजों के अनुमानों के अनुसार, एल-सैयद ने मिशिगन की महत्वपूर्ण सीनेट सीट पर जीत हासिल की। यह सीट मौजूदा डेमोक्रेटिक सीनेटर गैरी पीटर्स के रिटायर होने के कारण खाली हुई थी। इस मुकाबले पर पूरे अमेरिका की नजर थी, क्योंकि इसके नतीजे से सीनेट में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों की ताकत पर भी असर पड़ना था।

मिस्र मूल के अमेरिकी परिवार से ताल्लुक रखने वाले 42 वर्षीय अब्दुल एल-सैयद पेशे से डॉक्टर और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं। वह इससे पहले डेट्रॉयट और वेन काउंटी के स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उन्होंने 2018 में मिशिगन के गवर्नर का चुनाव भी लड़ा था, हालांकि उस समय उन्हें डेमोक्रेटिक पार्टी की प्राइमरी में कामयाबी नहीं मिली थी।

इस बार उनके चुनाव अभियान में आम लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं, महंगाई, रोजगार और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। उन्होंने सभी नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की सरकारी योजना मेडिकेयर फॉर ऑल का समर्थन किया। इसके अलावा उन्होंने चुनावी राजनीति में बड़ी कंपनियों और धनवान लोगों के बढ़ते प्रभाव को कम करने की बात भी कही।

चुनाव प्रचार के दौरान उनकी मुस्लिम पहचान और फिलिस्तीन के प्रति उनके नजरिये को लेकर भी काफी विवाद हुआ। रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से एल-सैयद पर इस्लामी कट्टरपंथ से सहानुभूति रखने के आरोप लगाए गए। एल-सैयद ने इन आरोपों को खारिज किया। उनके समर्थकों और नागरिक अधिकार संगठनों ने इस तरह के बयानों को इस्लामोफ़ोबिया और धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक निशाना बनाने की कोशिश बताया।

ग़ज़ा में इजराइली सैन्य कार्रवाई और इजराइल को अमेरिकी सैन्य सहायता का मुद्दा भी इस चुनाव में काफी अहम रहा। एल-सैयद ने ग़ज़ा में इजराइल की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की और अमेरिकी करदाताओं के पैसे को युद्ध के बजाय स्वास्थ्य सेवाओं और आम नागरिकों की जरूरतों पर खर्च करने की वकालत की। उनके इस रुख को लेकर इजराइल समर्थक समूहों और राजनीतिक विरोधियों ने भी अभियान चलाया।

मिशिगन में अरब और मुस्लिम आबादी की अच्छी-खासी मौजूदगी है। खासतौर पर डेट्रॉयट के आसपास डियरबॉर्न जैसे इलाकों में अरब-अमेरिकी मतदाताओं की भूमिका इस चुनाव में महत्वपूर्ण रही। एल-सैयद की जीत को इन समुदायों की राजनीतिक भागीदारी और प्रभाव के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।

अमेरिकी सीनेट देश की संसद का ऊपरी सदन है, जहां कानून बनाने, सरकारी नियुक्तियों की मंजूरी और विदेश नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों में प्रतिनिधियों की भूमिका होती है। ऐसे में एक मुस्लिम उम्मीदवार का इस सदन के लिए चुना जाना केवल व्यक्तिगत राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि अमेरिकी लोकतंत्र में धार्मिक विविधता और प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी एक ऐतिहासिक घटना है।

अब्दुल एल-सैयद की जीत ने यह संदेश दिया है कि अमेरिकी राजनीति में धार्मिक पहचान के आधार पर उठने वाली चुनौतियों के बावजूद चुनावी भागीदारी और जनता का समर्थन किसी भी समुदाय के लिए नए रास्ते खोल सकता है। उनकी आगामी भूमिका पर न केवल अमेरिकी मुस्लिम समुदाय, बल्कि दुनिया भर के लोकतंत्र और अल्पसंख्यक अधिकारों से जुड़े लोगों की नजर रहेगी।

-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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