जुमा की तवारीख़ और अहमियत

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(रईस खान)
इस्लामी कैलेंडर में जुमा का दिन (यौमुल जुमा) एक खास और फ़ज़ीलत वाला दिन है। यह न सिर्फ़ मुसलमानों के लिए हफ्ते का सबसे बेहतर दिन है, बल्कि कुरआन व हदीस में इस दिन की जो अहमियत बयान की गई है, वह इसे हफ्ते का सबसे अफ़ज़ल दिन बना देती है।

जुमा” अरबी लफ़्ज़ “जमा” से निकला है, जिसका मतलब है “इकट्ठा होना”। यह दिन मुसलमानों के आपसी इत्तिहाद, भाईचारे और सामूहिक इबादत की अलामत है। इसी दिन मस्जिदों में खासतौर पर खुतबा (प्रवचन) होता है और सामूहिक नमाज़ (नमाज़े जुमा) अदा की जाती है।

अल्लाह तआला ने “सूरह अल-जुमा” में इरशाद फरमाया:

“ऐ ईमान वालों! जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाए, तो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ दौड़ो और खरीद-बिक्री छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम समझो।”
(सूरह अल-जुमा 62:9)

यह आयत इस बात का साफ़ हुक्म देती है कि जुमा के दिन का एहतराम करते हुए सारे दुनियावी काम छोड़कर अल्लाह की इबादत की तरफ़ रुख किया जाए।

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया:

“जुमा का दिन दिनों का सरदार है और अल्लाह के नज़दीक सबसे अफ़ज़ल है।”
(सुनन इब्ने माजा)

“जो शख़्स जुमा के दिन ग़ुस्ल करता है, पाक कपड़े पहनता है, अत्तार लगाता है, मस्जिद जल्दी जाता है, खुतबा ध्यान से सुनता है – तो उसके इस जुमा से अगले जुमा तक के दरमियान के छोटे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।”
(सहीह मुस्लिम)

जुमा के दिन ज़ोहर की नमाज़ की जगह 2 रकात जुमा की फर्ज़ नमाज़ अदा की जाती है, जो खुतबे के बाद इमाम के पीछे पढ़ी जाती है। जुमा के दिन का खुतबा इस्लाम की शिक्षाओं को याद दिलाने और समाज की इस्लाही ज़रूरतों पर जोर देने का बेहतरीन ज़रिया होता है। खुतबे को खामोशी से सुनना वाजिब (अनिवार्य) है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने हिदायत दी कि जुमा के दिन दरूद शरीफ़ की खूब ज्यादा तिलावत की जाए, क्योंकि यह दिन उनके नाम का दिन है और उम्मत की दुआएं अल्लाह के यहां पेश की जाती हैं।

इस्लाम में पहले जुमा की नमाज़ हिजरत के बाद बनी सलीम के इलाके में अदा की गई थी, जहाँ रसूलुल्लाह ﷺ ने खुद इसकी इमामत की। इसके बाद से जुमा की नमाज़ उम्मते मुस्लिमा का एक मुस्तकिल हिस्सा बन गई।

यौमुल जुमा एक मुबारक दिन है, जिसे अल्लाह ने मुसलमानों के लिए ईद जैसा दिन बना दिया। यह दिन ताज़गी, इखलास और इत्तिहाद का पैग़ाम देता है। हमें चाहिए कि इस दिन की अहमियत को जानें, सुन्नतों पर अमल करें, और इस मौके को अल्लाह की रहमत और मग़फिरत के लिए इस्तेमाल करें।

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