गुलफिशा फातिमा को तिहाड़ से पांच साल की कैद के बाद मिली राहत

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(रईस खान)

सालों की लंबी कैद के बाद आखिरकार वो पल आ ही गया जब गुलफिशा फातिमा तिहाड़ जेल के दरवाजे से बाहर निकलीं। हाथों में बैग, गले में फूलों की माला और चेहरे पर मुस्कान, ये दृश्य देखकर परिवार और समर्थकों की आंखें नम हो गईं। 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में गिरफ्तार हुईं गुलफिशा को सुप्रीम कोर्ट की जमानत पर रिहा किया गया। उन्होंने 2 लाख रुपये का बॉन्ड जमा किया और अब घर लौट आई हैं।

गुलफिशा अप्रैल 2020 से जेल में थीं। यानी पूरे 5 साल और 9 महीने। पुलिस ने उन पर दंगों का षड्यंत्र रचने का इल्जाम लगाया था, UAPA कानून के तहत। लेकिन उनके समर्थक कहते हैं कि वो तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही थीं। 

ट्रायल अभी तक पूरा नहीं हुआ, और इतनी लंबी कैद को ही सजा बताया जा रहा है। उनके साथ शिफा उर रहमान, मीरान हैदर और मोहम्मद सलीम खान को भी रिहा किया गया। जमानत में सख्त शर्तें हैं, जैसे सार्वजनिक जीवन पर कुछ पाबंदियां।

रिहाई के वक्त जेल के बाहर का नजारा बड़ा भावुक था। रात के समय परिवार और दोस्त इंतजार कर रहे थे। गुलफिशा सफेद टॉप और मैरून शॉल में नजर आईं। बाहर निकलते ही परिवार ने गले लगाया, चूमा और आंसू पोछे। मीडिया के कैमरे चालू थे, लोग फोन से वीडियो बना रहे थे। फिर वो कार में बैठकर घर चली गईं, हाथ हिलाकर सबको विदा किया। ये पल जैसे सालों की तकलीफ का अंत था।

ट्विटर पर ये खबर आग की तरह फैल रही है। लोग “अल्हम्दुलिल्लाह” और “स्वतंत्रता की जीत” लिख रहे हैं। पत्रकार राना अय्यूब ने पहले उनकी कैद पर अफसोस जताया था, अब समर्थक राहत महसूस कर रहे हैं। मीडिया जैसे मकतूब और द ऑब्जर्वर पोस्ट ने इसे “2100 दिनों की कैद के बाद आजादी” बताया। कुछ लोग इसे न्याय की जीत मान रहे हैं, तो कुछ सिस्टम की आलोचना कर रहे कि बिना ट्रायल इतनी लंबी सजा क्यों?

गुलफिशा दिल्ली के सीलमपुर में पैदा हुईं, मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार से हैं। उम्र गिरफ्तारी के वक्त 26-28 साल के करीब। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ी मल कॉलेज से उर्दू ऑनर्स किया, फिर एमबीए। वो महिलाओं और अल्पसंख्यकों के हक के लिए लड़ती हैं। 2019-2020 में CAA और NRC के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहीं, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जहां महिलाओं को पढ़ाती और जागरूक करती थीं।

जेल में उन्होंने महिलाओं और बच्चों को तालीम दी, पेंटिंग की और कविताएं लिखीं। एक खत में लिखा: “मैं आजादी की तलबगार हूं”। वो फ्रंट लाइन डिफेंडर्स की मान्यता प्राप्त कार्यकर्ता हैं, और 100 भारतीय मुस्लिम प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में शामिल।

ये रिहाई एक बड़ा मोड़ है, लेकिन केस अभी चल रहा है। क्या ये न्याय की शुरुआत है या सिर्फ राहत? वक्त बताएगा।

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