(मुफ़्ती मुहम्मद इनामुल्लाह)
अल्हिरा फ़ाउंडेशन, मुंबई
इंसानी तारीख़ के मुख़्तलिफ़ पीरियड्स में इबादत के कई तसव्वुरात सामने आते हैं। कुछ मज़ाहिब ने इबादत को महज़ चंद मज़्हबी रुसूम तक महदूद रखा, बाज़ ने इसे ख़ानक़ाहों और इबादतगाहों में कैद कर दिया, जब्कि बाज़ फ़ल्सफ़ियाना नज़रियात में इबादत को सिर्फ़ एक दाख़िली रूहानी तज्रेबा क़रार दिया गया। लेकिन इस्लाम ने इबादत को जिस वुस्अत, गहराई और जामिइय्यत के साथ पेश किया है, वह इंसानी फ़िक्र व तहज़ीब की तारीख़ में एक यूनिक और बे-मिसाल मक़ाम रखता है।
इस्लाम के नज़दीक इबादत महज़ कुछ मख़्सूस आमाल या मुक़र्रर औक़ात में अल्लाह तआला को याद कर लेना या कुछ मरासिम की अदाइगी का नाम नहीं, बल्कि यह एक मुकम्मल तरीक़-ए-हयात, एक हमागीर निज़ाम-ए-बंदगी है जो इंसान की पूरी ज़िंदगी को अपने दायरा-ए-असर में ले लेता है। इस्लाम इंसान को सिर्फ़ मस्जिद का इबादतगुज़ार नहीं बनाता बल्कि उसे ज़िंदगी के हर लम्हे में बंदा बनने की तालीम देता है।
दर हक़ीक़त इबादत एक नूर है जो क़ल्ब व रूह को जिला बख़्शता है, वह पाकीज़ा ख़ुशबू है जो किरदार को महका देती है, और वह रोशनी है जो ज़िंदगी के हर पहलू को मुनव्वर कर देती है।
जब इबादत अपनी हक़ीक़ी रूह के साथ इंसान के दिल में जगह बना लेती है तो उसके ख़यालात, उसके इरादे, उसके आमाल और उसके तअल्लुक़ात व रिलेशन्स सभी अल्लाह तआला की रिज़ा के ताबे हो जाते हैं। क्योंकि हक़ीक़ी इबादत मस्जिद की चारदीवारी तक महदूद नहीं, बल्कि इंसान के हर क़ौल व फ़ेल, हर सोच और हर जज़्बे में शामिल एक ऐसी लतीफ़ हक़ीक़त है जो उसकी पूरी हयात को मक़सद-ए-बर्तर से हम-आहंग करती है।
यह महज़ सज्दों की ज़ीनत नहीं, बल्कि हुस्न-ए-किरदार, सच्चाई, दियानतदारी, सब्र व इसार की सूरत में भी जल्वा-गर होती है।
हर नेक अमल इबादत है, अगर वह इख़्लास के साथ बजा लाया जाए।
यह कोई जुज़्वक्ती सर्विस नहीं जो मुक़र्रर औक़ात तक महदूद हो, बल्कि यह एक मुसलसल, कुल-वक़्ती और हमापहलू वाबस्तगी है।
यह ऐसी बंदगी है जो सांसों में बस जाए तो फ़िक्रों को संवार दे, और अमल को रब की रिज़ा के ताबे कर दे।
जब बंदा अपनी हर नक़्ल व हरकत को इबादत का रूप देता है, तो उसका हर लम्हा बाइस-ए-अज्र व सवाब बन जाता है।
इबादत का जौहर सिर्फ़ रुकू और सज्दे में नहीं, बल्कि हर उस अमल में है जो अल्लाह तआला के अह्कामात की पासदारी और उसकी मख़लूक़ के साथ हुस्न-ए-सुलूक पर मब्नी हो।
वह ताजिर जो ईमानदारी से कारोबार करता है, वह आलिम जो ख़ुलूस से इल्म बांटता है, वह वालिदैन जो अपनी औलाद की परवरिश और अच्छी तरबियत में मशग़ूल रहते हैं, और हर वह शख़्स जो अपने फ़राइज़ की अदाइगी दियानतदारी से करता है ‘ सब इबादतगुज़ार हैं, बशर्ते कि उनके पेश-ए-नज़र रब्बुल आलमीन की रिज़ा हो।
सज्दा इबादत का एक पहलू ज़रूर है, मगर अस्ल इबादत यह है कि इंसान की पूरी ज़िंदगी सज्दा बन जाए…
हर सांस एक ज़िक्र बन जाए…
और हर अमल बंदगी का इस्तिआरा बन जाए…
क़ुरआन ए करीम ने जो इबादतों का मक़सद أقم الصلاة لذكري और لعلكم تتقون वग़ैरह के ज़रिए बयान किया है, उसका हासिल यही है।
फिर यह इबादत मक़सद-ए-तख़्लीक़ की तकमील भी है और इंसान के लिए दाइमी फ़लाह व सआदत का ज़रिया भी।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
قُلْ إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ (الانعام 162)
ऐ नबी आप कहिए कि मेरी नमाज़, मेरी क़ुर्बानी और मेरी ज़िंदगी व मौत सब कुछ अल्लाह रब्बुल आलमीन के लिए है।
▪️इबादत अरबी ज़बान का लफ़्ज़ “عبد” से मुश्तक़ है, जिसका मतलब बंदगी और मुकम्मल इताअत है।
الْعِبَادَةُ: الطَّاعَةُ وَالتَّذَلُّلُ وَالْخُضُوعُ (لسان العرب)
इबादत : फ़रमांबरदारी और आजिज़ी व इन्किसारी का नाम है।
▪️इमाम राग़िब इस्फ़हानी फ़रमाते हैं:
اَلْعِبَادَةُ: غَايَةُ التَّذَلُّلِ وَلَا يَسْتَحِقُّهَا إِلَّا مَنْ لَهُ غَايَةُ الْإِفْضَالِ (المفردات)
इबादत इंतिहाई दर्जा आजिज़ी का नाम है और इसका मुस्तहिक़ सिर्फ़ वही है जो इंतिहाई फ़ज़्ल व करम वाला हो।
▪️इमाम नववी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं:
الْعِبَادَةُ: إمْتِثَالُ أَمْرِ اللَّهِ عَلَى وَجْهِ التَّعْظِيمِ وَالْخُضُوعِ
अल्लाह तआला के हर हुक्म को उनकी ताज़ीम और अपनी आजिज़ी के साथ बजा लाने का नाम इबादत है।
▪️इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं:
حقيقة العبادة امتثال أمر الله واجتناب نهيه
इबादत की हक़ीक़त अल्लाह तआला के हुक्म की पैरवी और
उसकी मुमानअत से बचना है।
▪️अल्लामा इब्न तैमिया रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं:
الْعِبَادَةُ: اِسْمٌ جَامِعٌ لِكُلِّ مَا يُحِبُّهُ اللَّهُ وَيَرْضَاهُ مِنَ الْأَقْوَالِ وَالْأَعْمَالِ الظَّاهِرَةِ وَالْبَاطِنَةِ
इबादत एक जामे इस्तिलाह है जो उन तमाम अक़वाल व अफ़आल और ज़ाहिरी व बातिनी उमूर को शामिल है जो अल्लाह तआला को महबूब और पसंदीदा हैं।
अल्लाह तआला ने अंबिया-ए- किराम की बेअ्सत का बुनियादी मक़सद भी इबादत ही बयान फ़रमाया है।
وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ (النحل 36)
और हमने हर उम्मत में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत से बचो।
इसी तरह फ़रमाया गया:
إِنَّنِي أَنَا اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدْنِي وَأَقِمِ الصَّلَاةَ لِذِكْرِي (طه 14)
बेशक मैं अल्लाह हूं मेरे सिवा कोई माबूद नहीं इस लिए मेरी ही इबादत करो और नमाज़ मेरी याद के लिए कायम करो।
और इंसान व जिन की तख़्लीक़ का मक़सद भी यही बयान किया गया:
وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ (الذاريات 56)
सूरह बक़रह में पहला हुक्म भी इबादत ही का दिया गया:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ اعْبُدُوا رَبَّكُمُ (البقرة 21)
ऐ लोगो! अपने रब की इबादत करो जिसने तुम्हें पैदा किया।
▪️इबादत की क़िस्में!
इबादत की कई क़िस्में हैं:
▪️बदनी इबादत
▪️माली इबादत
▪️क़ौली इबादत
▪️क़ल्बी इबादत
▪️मामलाती इबादत
▪️ बदनी इबादत ▪️
इबादत महज़ अल्फ़ाज़ का विर्द नहीं, बल्कि यह बंदे की अपने रब के हुज़ूर अमली इताअत और ख़ुज़ू का इज़हार है।
इबादात-ए-बदनिया वह जिस्मानी आमाल हैं जो रूह की तहारत और क़ल्ब की रौशनी का सबब बनते हैं, जैसे नमाज़, रोज़ा, हज और जिहाद वग़ैरह।
▪️ नमाज़ में बंदा सज्दे की गहराई में जाकर अपनी आजिज़ी का एतराफ़ करता है।
▪️ रोज़ा भूख और प्यास की आज़माइश में सब्र की तस्वीर बन जाता है।
▪️ हज में दुनियावी पहचान मिटाकर बंदा ख़ालिस अब्दियत के पैकर में ढल जाता है।
▪️ और जिहाद में अपनी जान, माल और राहत को अपने रब की रिज़ा पर निछावर कर देता है।
ये इबादात सिर्फ़ जिस्मानी मशक़्क़त नहीं बल्कि रूह की बालिदगी और ईमान की ताज़गी का ज़रिया हैं।
जब बंदा अपने जिस्म को अल्लाह तआला के हुज़ूर झुका देता है, तब ही उसकी रूह को परवाज़ नसीब होती है और वह अब्दियत के हक़ीक़ी मफ़हूम से आश्ना होता है।
▪️ माली इबादत ▪️
माली इबादत सिर्फ़ साल में ढाई फ़ीसद ज़कात या सदक़ा-ए-फ़ित्र अदा कर देने का नाम नहीं, बल्कि इनकी अदायगी से मक़सूद फ़िक्री व क़ल्बी तज़किया और तरबियत भी है।
असल हक़ीक़त यह है कि जिस माल को हम अपना समझते हैं, दरअसल वह अल्लाह तआला की अमानत है। इसी एहसास के तहत इंसान के दिल में सख़ावत और हाथ में कुशादगी पैदा होती है।
माली इबादत के ज़रिये बंदा अपने माल व दौलत को अपने ख़ालिक़ की रज़ा के लिए खर्च करता है, फ़ानी सरमाये को बाक़ी अज्र में बदल देता है और दुनिया की दौलत को आख़िरत की कामयाबी का ज़ीना बना देता है।
ज़कात, सदक़ात, ख़ैरात, वक़्फ़ और इन्फ़ाक़ फ़ी सबीलिल्लाह , ये सब माली इबादात की रौशन सूरतें हैं।
ज़कात जहाँ माल की पाकीज़गी का ज़रिया है, वहीं सदक़ा दिल की वुस्अत और इसार की अलामत है।
किसी भूखे को खाना खिलाना, किसी नादार की मदद करना, किसी यतीम के सर पर दस्त-ए-शफ़क़त रखना’ ये सब ऐसे आमाल हैं जो सिर्फ़ माली लेन-देन नहीं बल्कि रूहानी शराफ़त का इज़हार हैं।
जब माल अल्लाह की राह में खर्च किया जाता है तो वही दौलत नूरानी सर्माया बन जाती है। यह वह तिजारत है जिसमें घाटे का सवाल ही पैदा नहीं होता, क्योंकि देने वाले अल्लाह तआला हैं और वह किसी का अज्र ज़ाया नहीं करते।
▪️ क़ौली इबादत ▪️
ज़बान इंसान के इज़्हार का सबसे अहम ज़रिया है। जब यही ज़बान अल्लाह तआला की रिज़ा के ताबे हो जाए तो इबादत बन जाती है।
क़ौली इबादत वह पाकीज़ा दौलत है जो न वक़्त की मोहताज है और न किसी ज़ाहिरी वसीले की।
ज़िक्र-ए-इलाही, तिलावत-ए-क़ुरआने करीम, दरूद शरीफ़, दुआ, तालीम व तरबियत, नसीहत, सच्चाई और मोहब्बत भरे अल्फ़ाज़ ‘ ये सब क़ौली इबादत की रौशन मिसालें हैं।
नबी करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
الكَلِمَةُ الطَّيِّبَةُ صَدَقَةٌ
(بخاری، مسلم)
अच्छी बात कहना भी सदक़ा है।
गोया नरमगोई, भलाई की नसीहत और सच्चे अल्फ़ाज़ दिलों को जोड़ते हैं और आख़िरत में अज्र का सबब बनते हैं।
▪️ क़ल्बी इबादत ▪️
इबादत की सबसे लतीफ़ और ख़ालिस सूरत क़ल्बी इबादत है। यह वह इबादत है जो दिल की दुनिया में अंजाम पाती है।
इख़्लास, मोहब्बत, ख़शिय्यत, रिज़ा और तवक्कुल , ये सब क़ल्बी इबादत के अहम अनासिर हैं।
जब दिल में अल्लाह की मोहब्बत पैदा हो जाए, उसकी अज़्मत का एहसास जाग उठे, उसका डर इंसान को गुनाह से रोक दे और हर हाल में उसी पर भरोसा कायम रहे , तो यही क़ल्बी इबादत है।
नबी ए करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
إِنَّ اللَّهَ لَا يَنْظُرُ إِلَى صُوَرِكُمْ وَأَمْوَالِكُمْ وَلَكِنْ يَنْظُرُ إِلَى قُلُوبِكُمْ وَأَعْمَالِكُمْ
(مسلم)
अल्लाह तआला तुम्हारी शक्लों और माल को नहीं देखते बल्कि तुम्हारे दिलों और आमाल को देखते हैं।
दरअसल क़ल्बी इबादत ही बंदगी की रूह है जो इंसान की पूरी ज़िंदगी को इबादत बना देती है।
▪️ मुआमलाती इबादत ▪️
अक्सर जब इबादत का ज़िक्र होता है तो ज़हन में नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज ही आते हैं, लेकिन इस्लाम ने इबादत के दायरे को बहुत वसीअ रखा है।
मुआमलाती इबादत दरअसल ज़िंदगी के तमाम मुआमलात में दीन को ज़िंदा करने का नाम है।
नबी ए करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
التَّاجِرُ الصَّدُوقُ الأَمِينُ مَعَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ
(سنن ترمذي)
सच्चा और अमानतदार ताजिर क़यामत के दिन अंबिया, सिद्दीक़ीन और शुहदा के साथ होगा।
जब इंसान हलाल रोज़ी कमाता है, वादों को पूरा करता है, लोगों के हक़ अदा करता है और इंसाफ़ से काम लेता है , तो यह सब इबादत बन जाता है।
एक माँ का बच्चों की परवरिश और अच्छी तरबियत करना,
एक बाप का मेहनत करके हलाल रोज़ी कमाना,
एक दोस्त का सच्ची नसीहत करना,
ये सब मुआमलाती इबादत की रौशन मिसालें हैं।
रसूलुल्लाह ﷺ इरशाद फ़रमातेहैं :
وفي بضع أحدكم صدقة
أرأيتم لو وضعها في حرام أكان عليه وزر؟ فكذلك إذا وضعها في الحلال كان له أجر
(مسلم)
यानि इंसान अपनी जायज़ ख्वाहिश भी हलाल तरीके से पूरी करे तो उस पर भी उसे अज्र मिलता है।
लेकिन याद रखना चाहिए कि इस्लाम में इबादत की अस्ल बुनियाद दिल की कैफ़ियत और बातिनी इख़्लास पर है।
इबादत की सेहत और क़बूलियत के लिए तीन बुनियादी अरकान हैं:
▪️ मोहब्बत
▪️ ख़ौफ़
▪️ रजा
मोहब्बत , बंदे को अपने रब की इताअत पर आमादा करती है।
ख़ौफ़ , उसे गुनाह से रोकता है।
और रजा उसे अल्लाह तआला की रहमत की उम्मीद में इबादत पर कायम रखती है।
जब ये तीनों कैफ़ियतें इकट्ठी हो जाती हैं तो बंदे की इबादत मुकम्मल और मक़बूल बन जाती है।
अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमें इबादत की हक़ीक़त समझने, उसे अपनी ज़िंदगी का मक़सद बनाने और इख़्लास के साथ उसे अंजाम देने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
आमीन।

