खिराज ए अकीदत  -बच्चों के अदब, उर्दू ज़बान और “गुलबूटे” के रौशन चराग़ थे फ़ारूक़ सैयद

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फ़ारूक़ सैयद साहब सिर्फ़ एक पत्रकार या मैगज़ीन के एडिटर नहीं थे, बल्कि बच्चों की सोच, तालीम और बेहतर परवरिश के लिए जीने वाले इंसान थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी उर्दू ज़बान, बच्चों के अदब और नई नस्ल को किताबों से जोड़ने के मिशन में लगा दी।

उनका नाम बच्चों के मशहूर रिसाले “गुलबूटे” के साथ हमेशा याद किया जाएगा। जब लोग बच्चों के लिए लिखना छोड़ रहे थे, तब फ़ारूक़ सैयद साहब ने बच्चों के लिए सोचना, लिखना और उन्हें अच्छी तालीम और अच्छे अख़लाक़ देना अपना फ़र्ज़ समझा।

“गुलबूटे”, सिर्फ़ एक मैगज़ीन नहीं, एक तहरीक

फ़ारूक़ सैयद साहब का सबसे बड़ा काम बच्चों का रिसाला “गुलबूटे” था। यह सिर्फ़ कहानियों की किताब नहीं थी, बल्कि बच्चों को अच्छी बातें सिखाने, उर्दू से मोहब्बत पैदा करने, पढ़ने की आदत डालने,

तहज़ीब और इंसानियत समझाने का एक खूबसूरत ज़रिया थी।

उन्होंने उस दौर में बच्चों के लिए काम किया जब मोबाइल और टीवी किताबों की जगह लेते जा रहे थे। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कम साधनों के बावजूद “गुलबूटे” को घर-घर पहुँचाया।

बच्चों से बेपनाह मोहब्बत

फ़ारूक़ सैयद साहब बच्चों को मुल्क का भविष्य मानते थे।उनका कहना था: “अगर बच्चों को अच्छी किताबें मिलेंगी, तो समाज बेहतर बनेगा।” वह चाहते थे कि बच्चे सिर्फ़ पढ़े-लिखे नहीं, बल्कि अच्छे इंसान बनें। इसीलिए “गुलबूटे” में हमेशा ऐसी बातें होती थीं जो बच्चों में: सच बोलने की आदत, बड़ों की इज़्ज़त, मेहनत, ईमानदारी,मोहब्बत और इंसानियत पैदा करें।

मुश्किल हालात में भी हौसला

फ़ारूक़ सैयद साहब की ज़िंदगी आसान नहीं थी। उन्होंने ग़रीबी, मुश्किल हालात और संघर्ष देखा, मगर कभी हार नहीं मानी। छोटे-छोटे काम किए, मेहनत की, और फिर पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने साबित किया कि: “अगर इरादा नेक हो, तो इंसान अकेला होकर भी बड़ा काम कर सकता है।”

नई टेक्नोलॉजी के साथ उर्दू को जोड़ने की कोशिश

जब दुनिया इंटरनेट और सोशल मीडिया की तरफ़ बढ़ रही थी, तब उन्होंने “गुलबूटे” को ऑनलाइन पहचान देने की कोशिश की। वह चाहते थे कि नई नस्ल मोबाइल पर भी उर्दू पढ़े और अपनी ज़बान से जुड़ी रहे। यह उनकी दूरअंदेशी थी कि उन्होंने समय के साथ चलने की अहमियत समझी।

फ़ारूक़ सैयद साहब से बच्चों के लिए ख़ास पैग़ाम

प्यारे बच्चों!

फ़ारूक़ सैयद साहब की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि:

किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं।

अपनी भाषा और तहज़ीब से मोहब्बत करनी चाहिए।

मेहनत और अच्छे अख़लाक़ इंसान को बड़ा बनाते हैं।

दूसरों की मदद करना सबसे बड़ी इंसानियत है।

मोबाइल से ज़्यादा ज़रूरी किताब और इल्म है।

अगर बच्चे पढ़ेंगे, सीखेंगे और अच्छे इंसान बनेंगे, तो यही फ़ारूक़ सैयद साहब के लिए सबसे बड़ी खिराज ए अकीदत होगी।

यादगार अल्फ़ाज़

“कुछ लोग दुनिया से चले जाते हैं, मगर उनका काम और उनकी सोच हमेशा ज़िंदा रहती है।” फ़ारूक़ सैयद साहब भी ऐसे ही इंसान थे।

उन्होंने बच्चों के लिए एक चराग़ जलाया, और आज भी उस चराग़ की रोशनी आने वाली नस्लों को राह दिखा रही है।

अल्लाह उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस अता फ़रमाए।

क़ौमी फरमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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