हर साल मुहर्रम का चांद दिखाई देता है और इस्लामी हिजरी कैलेंडर का नया साल शुरू हो जाता है। ऐसे में बहुत से लोग सवाल करते हैं कि जब दुनिया की दूसरी कौमें नया साल मनाती हैं, तो मुसलमान इस्लामिक नया साल धूमधाम से क्यों नहीं मनाते? एक-दूसरे को “हैप्पी न्यू ईयर” या “मुबारकबाद” क्यों नहीं देते?
इस्लाम का अपना हिजरी कैलेंडर है, जो चांद के देखने पर आधारित है। यह सूरज के कैलेंडर ग्रेगोरियन से अलग है, इसमें साल 354-355 दिन का होता है, इसलिए हर साल 10-12 दिन पहले आता है।
इस्लामी नया साल मुहर्रम के महीने की पहली तारीख को शुरू होता है। यह हिजरत, हिजरी की याद दिलाता है, जब पैगंबर मुहम्मद ﷺ और उनके साथी मक्का से मदीना गए थे , 622 ईस्वी। यह नया सफर, त्याग और ईमान की नई शुरुआत का प्रतीक है।
मुहर्रम इस्लाम के चार पवित्र महीनों में से एक है। इसमें लड़ाई-झगड़ा हराम है। इसमें आशूरा, 10 मुहर्रम आता है, जो इमाम हुसैन रज़ि. की शहादत और अन्य पैगंबरों की घटनाओं की याद है। कई मुसलमान इस महीने में रोजा रखते हैं, कुरान पढ़ते हैं, दुआ करते हैं और गम व इबादत में गुजारते हैं, जश्न नहीं।
कुरआन और सहीह हदीसों में कहीं भी इस बात का हुक्म नहीं मिलता कि मुहर्रम की पहली तारीख को कोई खास त्योहार मनाया जाए, विशेष इबादत की जाए या नए साल की मुबारकबाद देना जरूरी समझा जाए। नबी ﷺ, सहाबा-ए-किराम, ताबेईन और शुरुआती मुसलमानों से भी इस दिन को त्योहार की तरह मनाना साबित नहीं है।
हालांकि, अगर कोई व्यक्ति नए साल के मौके पर किसी को दुआ दे दे, जैसे “अल्लाह आने वाला साल आपके लिए बरकत वाला बनाए”, तो बहुत से आलिम इसे सामान्य दुआ के तौर पर जायज मानते हैं। लेकिन इसे धार्मिक रस्म, जरूरी अमल या त्योहार का हिस्सा नहीं समझा जाता।
असल में मुहर्रम का महीना हमें जश्न से ज्यादा आत्ममंथन, तौबा, इबादत और इतिहास से सीख लेने का संदेश देता है। यह महीना हमें याद दिलाता है कि अल्लाह के रास्ते में कुर्बानी, सब्र और सच्चाई की कितनी अहमियत है।
इसलिए अधिकांश मुसलमान इस्लामिक नए साल को शोर-शराबे, पार्टियों या विशेष उत्सव के रूप में नहीं मनाते। वे इसे एक नए साल की शुरुआत के रूप में देखते हैं, जहां इंसान अपने पिछले साल का हिसाब करे, अपनी गलतियों से तौबा करे और आने वाले दिनों के लिए बेहतर इंसान बनने का संकल्प ले।
इस्लामी नया साल कैसे मनाएं, इस पर लोगों का कहना है कि परिवार के साथ समय बिताएं, अच्छे कामों की नीयत करें जैसे नमाज, रोजा, सदका, कुरान।पिछले साल की गलतियों से सबक लें और अल्लाह से माफी मांगें। शांति, भाईचारे और अच्छाई की दुआ करें।
यही इस्लाम की संतुलित और प्रामाणिक शिक्षा है, जश्न से ज्यादा आत्मसुधार, रस्मों से ज्यादा अमल, और दिखावे से ज्यादा अल्लाह की बंदगी।
इस विषय में उलमा के बीच मुबारकबाद देने के बारे में अलग-अलग राय मिलती हैं। अधिकांश विद्वान इसे न तो सुन्नत मानते हैं और न ही जरूरी, जबकि कुछ इसे सामान्य दुआ और शुभकामना के रूप में जायज मानते हैं। इसलिए इसे धार्मिक अनिवार्यता या त्योहार की रस्म नहीं समझना चाहिए।
– क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

