इंपैक इंटेलेक्चुअल मीट: मिल्लत के इत्तेहाद, तरक़्क़ी और लीडरशिप पर मंथन

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                     (नई दिल्ली से रईस खान)
26 जुलाई, होटल रिवर व्यू, ओखला में इंडियन मुस्लिम पब्लिक अफेयर्स कमेटी इंपैक, IMPAC की दिल्ली-एनसीआर इंटेलेक्चुअल मीट आयोजित हुई। बैठक की अध्यक्षता इंपैक के अध्यक्ष हज़रत मौलाना उबैदुल्लाह खान आज़मी ने की। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आए शिक्षाविदों, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक का मुख्य विषय था—”Vision: Safety, Security and Development”।

बैठक में वक्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि मुस्लिम समाज अक्सर सुरक्षा, डिफेंस, सेफ्टी और दूसरे संवेदनशील मुद्दों में उलझकर अपनी असली ताक़त और विकास के एजेंडे से दूर हो जाता है। वक्ताओं ने कहा कि अब समय आ गया है कि समाज एक नई हिकमत-ए-अमली के साथ आगे बढ़े और आपसी मतभेदों को भुलाकर एक उम्मत और एक क़ौम की तरह काम करे।

मौलाना उबैदुल्लाह खान आज़मी: “कश्ती में तूफ़ान है

अपने अध्यक्षीय संबोधन में मौलाना उबैदुल्लाह खान आज़मी ने कहा कि आज मिल्लत की सबसे बड़ी समस्या बाहर का तूफ़ान नहीं, बल्कि अंदर की फूट है। उन्होंने कहा,

“मिल्लत की कश्ती तूफ़ान में नहीं है, बल्कि कश्ती में ही तूफ़ान है।”

उन्होंने कहा कि मुसलमानों को मसलकी और फिरकावाराना पहचान से ऊपर उठकर केवल मुसलमान बनने की ज़रूरत है। कुरआन, इस्लाम और नबी-ए-करीम ﷺ की सीरत सबकी एक है। आख़िरी ख़ुत्बे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इस्लाम नस्ल, भाषा और रंग के आधार पर किसी को दूसरे पर श्रेष्ठ नहीं मानता।

उन्होंने कहा कि अगर मुसलमान सीरत-ए-नबवी को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लें तो कामयाबी खुद-ब-खुद मिल जाएगी। इंपैक न किसी सियासी पार्टी का मंच है और न किसी मसलक का, बल्कि इसका मकसद अल्लाह की इबादत और इंसानों की ख़िदमत है। उन्होंने समाज के लोगों से अपील की कि वे अपना समय, क्षमता और संसाधन मिल्लत की बेहतरी के लिए दें।

डॉ. असमा ज़हरा: महिलाओं की तरक़्क़ी से बदलेगा समाज

इंपैक की ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी और ऑल इंडिया विमेंस एसोसिएशन की अध्यक्ष डॉ. असमा ज़हरा ने मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर विस्तार से बात की।

उन्होंने बताया कि पिछले 28 वर्षों से हैदराबाद में बिना सूद के सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम किया जा रहा है। आज लगभग 150 से 200 महिला समूह बचत, छोटे कारोबार और आपसी सहयोग के ज़रिए आर्थिक रूप से मज़बूत हो चुके हैं। महिलाएं मिलकर राशन, कपड़े, अचार और अन्य घरेलू उत्पादों का कारोबार कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि समाज में आज भी मुस्लिम महिलाओं को कई तरह की परेशानियों और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कई बार सिर्फ़ हिजाब या स्कार्फ़ की वजह से भी उन्हें शोषण झेलना पड़ता है।

उन्होंने एक घटना का ज़िक्र करते हुए बताया कि मुरादाबाद में महिलाओं को मस्जिद में जागरूक करने का कार्यक्रम भी नहीं करने दिया गया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं के समाधान के लिए गंभीर प्रयासों की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में काम करने का भी अनुभव है।

कलीमुल हफ़ीज़: समाज को कैडर और ट्रेनिंग की ज़रूरत

होटल रिवर व्यू के संचालक कलीमुल हफ़ीज़ ने कहा कि आज़ादी के बाद उत्तर भारत में मजबूत सामाजिक नेतृत्व तैयार नहीं हो पाया, जबकि दक्षिण भारत विशेषकर केरल ने शिक्षा, व्यापार, नौकरी और सामाजिक नेतृत्व में उल्लेखनीय प्रगति की है।

उन्होंने कहा कि समाज में केवल भाषणों से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि जमीनी कैडर तैयार करने होंगे। इसके लिए उन्होंने 15 दिन का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने की जानकारी दी, जिसमें युवाओं को नेतृत्व, संगठन और समाज सेवा की ट्रेनिंग दी जाएगी। यह प्रशिक्षण बदायूं के एक सीबीएसई स्कूल में आयोजित करने की योजना है।

उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को बड़ी इमारत बनने की नहीं, बल्कि उसकी बुनियादी ईंट बनने की सोच रखनी चाहिए।

नाजमुद्दीन फारूकी: चुनौतियों का जवाब कौशल और एकता से

इंपैक के सेक्रेटरी जनरल नाजमुद्दीन फारूकी ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि भारत में मुसलमानों ने लंबे समय से अनेक चुनौतियों का सामना किया है। उन्होंने वक्फ़, कश्मीर, शिक्षा, मदरसों, पर्सनल लॉ और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखते हुए कहा कि आज समाज को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संगठित और सकारात्मक काम की ज़रूरत है।

उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों में मुसलमान अलग-अलग तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में समाज को स्किल डेवलपमेंट, रोज़गार, ट्रेनिंग और शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्होंने अफ़सोस जताया कि अक्सर समाज के लोग एक-दूसरे की आलोचना में अधिक समय लगाते हैं, जबकि मिलकर काम करने की ज़रूरत है।

इत्तेहाद ही तरक़्क़ी का रास्ता

बैठक में बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया गया कि मुसलमानों की पहचान उनका कलिमा, कुरआन और सुन्नत है, न कि आपसी मतभेद। वक्ताओं ने कहा कि गरीबों की समस्याओं को हल करना, युवाओं को प्रशिक्षित करना, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और समाज में सेवा की भावना पैदा करना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

वक्ताओं ने यह भी कहा कि समाज के भीतर होने वाली बेवजह की आलोचना और आपसी दूरी को खत्म करके इत्तेहाद की फिज़ा पैदा करनी होगी। यही वह रास्ता है जो सुरक्षा, सम्मान और विकास की मंज़िल तक ले जा सकता है।

दिल्ली में आयोजित इंपैक की यह इंटेलेक्चुअल मीट केवल एक बैठक नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के सामने मौजूद चुनौतियों और उनके समाधान पर गंभीर मंथन का मंच साबित हुई। बैठक का संदेश साफ़ था कि अगर समाज शिक्षा, कौशल, आर्थिक आत्मनिर्भरता, महिला सशक्तिकरण और आपसी इत्तेहाद को प्राथमिकता देगा, तो तरक़्क़ी का रास्ता और आसान होगा।

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