(शमा परवीन)
कभी-कभी एक शहर की भीड़ में कोई ऐसा मंज़र सामने आता है, जो तमाम शोर को अचानक खामोश कर देता है। दिल्ली के एम्स के बाहर ऐसा ही एक मंज़र दिखाई दिया। एक मां अपनी छोटी बच्ची को गोद में लिए परेशान बैठी थी। बच्ची गंभीर और दुर्लभ बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (SMA) टाइप-1 से जूझ रही थी। इलाज के लिए परिवार के सामने करोड़ों रुपये जुटाने की चुनौती थी।
बच्ची की हालत देखकर वहां मौजूद सोशल मीडिया क्रिएटर सनी महोर और उनके साथियों ने मां से बात की। उन्होंने बच्ची की बीमारी और इलाज की जरूरत को समझा और मदद के लिए लोगों से अपील शुरू कर दी। शुरुआत एम्स के बाहर से हुई, लेकिन धीरे-धीरे यह छोटी-सी कोशिश एक बड़ी मुहिम में बदल गई।
बीमारी से बड़ी रकम
SMA टाइप-1 एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें शरीर की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली मोटर न्यूरॉन्स प्रभावित होती हैं। गंभीर मामलों में बच्चे को बैठने, निगलने और सांस लेने तक में परेशानी हो सकती है।
इस बच्ची के परिवार के मुताबिक इलाज के लिए जिस विशेष जीन थेरेपी/इंजेक्शन की जरूरत है, उसकी लागत कई करोड़ रुपये है। अलग-अलग रिपोर्टों में इलाज की जरूरत करीब ₹9 करोड़ से ₹9.7 करोड़ बताई गई है। हालांकि, इस खास बच्ची के इलाज की अंतिम लागत और इस्तेमाल होने वाली दवा की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
यही वह रकम थी, जिसने एक आम परिवार के सामने जिंदगी और मजबूरी के बीच बहुत बड़ी दीवार खड़ी कर दी थी।
एम्स से जामा मस्जिद तक
मदद की अपील को आगे बढ़ाते हुए सनी महोर और उनके साथी दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद पहुंचे। जुमे की नमाज के बाद उन्होंने नमाजियों से बच्ची के इलाज के लिए मदद की अपील की।
लोगों को बच्ची और उसकी मां की तस्वीरें और इलाज की जानकारी दिखाई गई। टी-शर्ट पर बच्ची की तस्वीर और जानकारी थी और डिजिटल मदद के लिए QR कोड भी लगाया गया था। इसके बाद लोग अपनी हैसियत के मुताबिक मदद करने लगे। किसी ने कम रकम दी, किसी ने ज्यादा, लेकिन मकसद एक था, एक मासूम जिंदगी को बचाने की कोशिश।
रिपोर्टों के मुताबिक इस मुहिम से करीब ₹6.33 करोड़ जुटाए गए, जबकि इलाज के लिए बताई गई रकम करीब ₹9.7 करोड़ थी। यानी अभी भी बड़ी रकम की जरूरत बताई जा रही थी।
नाम नहीं, दर्द देखा
इस कहानी का सबसे भावुक पहलू यह है कि बच्ची का धर्म मदद के रास्ते में नहीं आया। वह एक हिंदू परिवार की बच्ची थी और मदद की अपील दिल्ली की जामा मस्जिद के बाहर की जा रही थी।
वहां मौजूद लोगों ने बीमारी और परिवार की परेशानी सुनी और अपनी क्षमता के मुताबिक योगदान दिया। रिपोर्टों के मुताबिक बच्ची की मां ने बताया कि उसकी बेटी ज्यादातर समय बिस्तर पर रहती है और पानी पीने जैसी छोटी-सी जरूरत के लिए भी किसी की मदद की जरूरत पड़ती है। मां की सबसे बड़ी ख्वाहिश यही है कि उसकी बेटी दूसरे बच्चों की तरह स्वस्थ होकर खेले और उसे मां कहकर पुकारे।
यही दर्द शायद उन सैकड़ों लोगों को एक-दूसरे के करीब ले आया।
बीमारी से लड़ाई, समाज का आईना
SMA जैसी दुर्लभ बीमारियों का इलाज सिर्फ मेडिकल चुनौती नहीं, बल्कि आर्थिक चुनौती भी बन जाता है। जीन थेरेपी की कीमत कई परिवारों की पूरी जिंदगी की कमाई से भी कहीं ज्यादा हो सकती है।
मई 2026 में दिल्ली की एक दूसरी बच्ची को भी SMA के इलाज के लिए लगभग ₹9 करोड़ की क्राउडफंडिंग के बाद AIIMS में Zolgensma जीन थेरेपी दी गई थी। इससे यह समझ आता है कि भारत में दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए क्राउडफंडिंग किस तरह परिवारों के लिए सहारा बन रही है।
लेकिन हर परिवार सोशल मीडिया पर अपनी कहानी नहीं पहुंचा पाता। हर बच्ची के लिए सैकड़ों हाथ नहीं उठते। इसलिए यह मामला सिर्फ एक बच्ची के इलाज की कहानी नहीं, बल्कि उस बड़े सवाल की तरफ भी इशारा करता है कि बेहद महंगे दुर्लभ रोगों का इलाज आम परिवारों की पहुंच में कैसे आए।
इंसानियत की कोई सरहद नहीं
आज जब सोशल मीडिया पर धर्म के नाम पर बहसें और टकराव अक्सर सुर्खियां बनते हैं, उसी दौर में दिल्ली से आई यह तस्वीर एक दूसरी कहानी कहती है।
एक मां अपनी बच्ची के लिए परेशान थी। कुछ युवाओं ने उसका दर्द देखा। फिर एक मस्जिद के बाहर सैकड़ों लोग उस दर्द के साथ खड़े हो गए।
न किसी से उसका मजहब पूछा गया, न जात पूछी गई। सामने सिर्फ एक बीमार बच्ची थी और उसके इलाज की जरूरत।
शायद इंसानियत की असली पहचान यही है, जब सामने किसी इंसान की जिंदगी का सवाल हो तो पहचान उसके नाम या मजहब से नहीं, उसके दर्द से होती है।
नफ़रत के बाज़ार में मुहब्बत के सौदागर आज भी मौजूद हैं।
वे शोर नहीं करते।
वे बस किसी की मुश्किल देखकर अपना हाथ आगे बढ़ा देते हैं।
और कभी-कभी वही हाथ किसी मासूम की जिंदगी और मौत के बीच उम्मीद की आखिरी डोर बन जाता है।

