नाना पाटेकर: कलाकार चला गया, मगर इंसानियत बोलती रहेगी

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पर्दे पर गूंजती आवाज़ खामोश हुई, मगर उनके किरदार जिंदा रहेंगे

(शिब्ली रामपुरी) 

हिंदी और मराठी सिनेमा के बेमिसाल कलाकार नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। 8 अक्टूबर 2026 की सुबह 75 साल की उम्र में गोवा में उनका निधन हो गया। उनके जाने से भारतीय सिनेमा ने सिर्फ एक बड़ा अभिनेता नहीं खोया, बल्कि ऐसी आवाज़ खो दी जो पर्दे पर आते ही आम आदमी के दर्द, गुस्से, बेबसी और इंसानियत को अपनी आवाज़ दे देती थी।

नाना की अदायगी में दिखावा कम और जिंदगी की सच्चाई ज्यादा थी। उनकी आवाज़ में एक खास खुरदरापन था, आंखों में किरदार का दर्द और संवादों में ऐसी ताकत कि एक छोटा-सा वाक्य भी लंबे समय तक याद रह जाता था।

लेकिन नाना पाटेकर को याद करने की एक खास वजह उनके वे किरदार भी हैं, जिनमें मजहब की पहचान से आगे इंसान दिखाई देता था।

मुस्तफा: अपराध की दुनिया में इंसान की तलाश

1997 की फिल्म ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ नाना के करियर की उन फिल्मों में शामिल है, जिसमें उन्होंने एक मुस्लिम किरदार को पूरी शिद्दत के साथ जिया।

मुस्तफा अपराध की दुनिया में पला-बढ़ा एक गैंगस्टर है। उसकी जिंदगी में जुर्म है, हिंसा है, लेकिन उसके भीतर भावनाएं और रिश्ते भी हैं। फिल्म में उसके मुस्लिम होने की पहचान सिर्फ नाम तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसके रहन-सहन और धार्मिक जीवन का हिस्सा भी कहानी में दिखाई देता है।

नाना ने मुस्तफा को सिर्फ एक खतरनाक आदमी बनाकर नहीं छोड़ा। उन्होंने उसके भीतर मौजूद इंसान की बेचैनी और भावनाओं को भी सामने रखा।

यही वजह है कि मुस्तफा आज भी नाना के सबसे यादगार किरदारों में गिना जाता है।

अब्दुल: दोस्ती और संघर्ष की कहानी

साल 2000 की फिल्म ‘गैंग’ में नाना ने अब्दुल का किरदार निभाया।

अब्दुल एक अनाथ और जेबकतरा है, जो पैसे कमाने के लिए गलत रास्तों पर चला जाता है। फिल्म चार दोस्तों की कहानी के जरिए दोस्ती, गरीबी, अपराध और हालात की मार को सामने लाती है।

नाना ने अब्दुल को भी किसी एक पहचान में कैद नहीं किया। उनके अभिनय में वह एक ऐसा इंसान बनकर सामने आया, जिसकी जिंदगी को समझने के लिए उसके हालात को समझना जरूरी है।

तबरेज़ आलम: खुरदुरा अंदाज़, यादगार असर

2005 की ‘अपहरण’ में नाना ने तबरेज़ आलम का किरदार निभाया। यह उनकी उन भूमिकाओं में था, जिसमें उनकी आवाज़, चेहरे की सख्ती और संवाद बोलने का अंदाज़ मिलकर एक बेहद प्रभावशाली शख्सियत तैयार करते हैं। उनके इस किरदार के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार भी मिला।

नाना की खासियत यही थी कि वह किसी किरदार को सिर्फ “अच्छा” या “बुरा” बनाकर नहीं छोड़ते थे। वह उसके अंदर की पूरी कहानी को अपने अभिनय में उतार देते थे।

लियाकत कुरैशी: वर्दी में एक और चेहरा

2003 की फिल्म ‘भूत’ में उन्होंने पुलिस इंस्पेक्टर लियाकत कुरैशी की भूमिका निभाई। यह भी उनके मुस्लिम नाम वाले यादगार किरदारों में शामिल है।

नाना के ऐसे किरदारों को याद करने की वजह सिर्फ यह नहीं कि उन्होंने मुस्लिम नाम निभाए। असली बात यह है कि उन्होंने इन किरदारों को सिर्फ मजहबी पहचान नहीं, बल्कि पूरी इंसानी शख्सियत दी।

‘क्रांतिवीर’: जब नाना ने पूछ लिया, खून का मजहब क्या होता है?

नाना पाटेकर की विरासत में ‘क्रांतिवीर’ का जिक्र शायद सबसे अलग अंदाज़ में होना चाहिए।

1994 की इस फिल्म में उन्होंने प्रताप नारायण तिलक का किरदार निभाया। फिल्म के एक बेहद चर्चित दृश्य में वह हिंदू-मुस्लिम के नाम पर होने वाली नफरत पर सीधा सवाल खड़ा करते हैं, आखिर इंसान के खून को हिंदू और मुसलमान के खून में कैसे बांटा जा सकता है? यह दृश्य आज भी उनके सबसे यादगार फिल्मी पलों में गिना जाता है।

यही वह नाना थे, जो पर्दे पर गुस्से में बोलते हुए भी इंसानियत की बात कर रहे थे।

उनका संदेश साफ था,

मजहब इंसान की पहचान हो सकता है, लेकिन इंसानियत से बड़ा नहीं।

‘तिरंगा’: देश सबसे ऊपर

‘तिरंगा’ में नाना ने शिवाजीराव वागले का किरदार निभाया। यह मुस्लिम भूमिका नहीं थी, लेकिन नाना के फिल्मी सफर को समझने के लिए यह फिल्म भी अहम है।

उनकी देशभक्ति किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं थी। उनके किरदारों में हिंदू, मुस्लिम, पुलिस वाला, फौजी, मजदूर, अपराधी और आम आदमी, सब आए।

मगर हर किरदार में एक चीज़ बार-बार दिखाई दी,

इंसान।

नाना की आवाज़ में आम आदमी बोलता था

नाना पाटेकर की सबसे बड़ी ताकत उनकी आवाज़ थी, लेकिन उससे भी बड़ी ताकत थी उस आवाज़ के पीछे का एहसास।

वह जब गुस्सा करते थे तो लगता था कोई दबा हुआ इंसान बोल रहा है।

वह जब दर्द में होते थे तो पर्दे पर बैठे दर्शक भी चुप हो जाते थे।

और जब मजहबी नफरत पर सवाल उठाते थे तो लगता था कि यह सिर्फ फिल्म का संवाद नहीं, बल्कि समाज से पूछा गया कोई जरूरी सवाल है।

एक कलाकार, कई रंग

‘गमन’ से शुरू हुआ उनका सफर ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्नि साक्षी’, ‘खामोशी’, ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसे अलग-अलग रंगों से गुजरता रहा।

वह खलनायक बने तो डर पैदा किया।

हीरो बने तो जोश पैदा किया।

पुलिस अफसर बने तो सख्ती दिखाई।

और ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी बने तो वही नाना लोगों को हंसाते हुए नजर आए।

लगभग पांच दशक के इस सफर में उन्होंने तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते और 2013 में पद्म श्री से सम्मानित हुए।

नाना नहीं रहे, मगर नाना की आवाज़ रहेगी

आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं।

मगर सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनकी मौत के बाद उनकी फिल्में सिर्फ फिल्में नहीं रह जातीं, वे उनकी आवाज़ बन जाती हैं।

‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ का मुस्तफा याद आएगा।

‘गैंग’ का अब्दुल याद आएगा।

‘अपहरण’ का तबरेज़ आलम याद आएगा।

‘भूत’ का लियाकत कुरैशी याद आएगा।

और ‘क्रांतिवीर’ का वह प्रताप भी याद आएगा, जो मजहब के नाम पर बंटे समाज से इंसानियत का सवाल पूछ रहा था।

यही नाना की सबसे बड़ी विरासत है,किरदार अलग थे, लेकिन उनके अभिनय में इंसान हमेशा एक था।

आज उस बुलंद आवाज़ को खिराज-ए-अकीदत।

नाना पाटेकर नहीं रहे,

लेकिन उनके किरदारों की आवाज़ बहुत देर तक सुनाई देती रहेगी।

और शायद यही एक बड़े कलाकार की असली जिंदगी है,

वह चला जाता है, मगर उसका अभिनय लोगों के दिलों में जिंदा रहता है।

–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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