मुसलमानों से अपील – तरक़्क़ी की राह चुनो

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 (रईस खान)

आज मुल्क में नफ़रत की सियासत अपने चरम पर है। 17 करोड़ मुसलमानों को 123 करोड़ हिंदुओं से लड़ाकर असल मसाइल से तवज्जोह हटाई जा रही है। हर मुद्दे पर औरंगज़ेब, बाबर और मुग़लों का नाम लेकर मुसलमानों को भड़काने की साज़िश हो रही है ताकि वे अपने असल मक्सद—इल्म, रोज़गार और खुदमुख़्तारी—से भटक जाएँ। मगर अब वक़्त आ गया है कि मुसलमान समझें कि यह जंग उनकी नहीं, बल्कि पूरे महरूम तबक़े को हाशिए पर डालने की चाल है।

मुसलमानों से मेरी अपील:

माज़ी की ज़ंजीरों को तोड़ो

• तारीख़ी इख़्तिलाफ़ात में उलझने की ज़रूरत नहीं। औरंगज़ेब और बाबर की बहस में फंसकर अपनी क़ीमती तवानाई ज़ाया मत करो।

• हर बयान और हर फितने पर रद्द-ए-अमल देना ज़रूरी नहीं, इससे सिर्फ़ आपका ध्यान बँटेगा।

• जो लोग नफ़रत फैला रहे हैं, उन्हें उनका काम करने दो—आप अपने मुस्तक़बिल को संवारने में लगो।

साज़िश को पहचानो

• नफ़रत फैलाने वालों का असल मक़सद 17 करोड़ मुसलमानों को बदनाम कर 123 करोड़ हिंदुओं को आपस में लड़ाना है।

• यह आपकी जंग नहीं है—यह एक सियासी चाल है, जिससे समाज में तफरक़ा पैदा किया जाए।

• जब आप हर झगड़े में कूदेंगे, तो आपकी तरक़्क़ी रुक जाएगी, और यही वे चाहते हैं।

तरक़्क़ी की राह इख़्तियार करो

• इल्म आपकी सबसे बड़ी ताक़त है। तालीम हासिल करो, अपने आप को मज़बूत बनाओ।

• कारोबार, तिजारत और खुदमुख़्तारी पर तवज्जोह दो।

• हर फितने का हिस्सा बनने से बेहतर है कि अपनी तवानाई अपने करियर और तरक़्क़ी पर लगाओ।

• जो लोग आपको कमज़ोर समझते हैं, उन्हें अपनी कामयाबी से जवाब दो।

नफ़रत की सियासत को समझो

• जो लोग हर ईद, हर बयान और हर मसले में मुसलमानों को घसीटते हैं, उनका असल मंसूबा समाज में दरार डालना है।

• दलित, पिछड़े और महरूम तबक़े को उनके हुक़ूक़ से दूर रखने के लिए मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है।

• असल नुक़सान पूरे महरूम समाज का हो रहा है, और इस हक़ीक़त को समझना लाज़िमी है।

अपना मरकज़ मत खोओ

• जितना ज़्यादा तरक़्क़ी करोगे, उतनी ही तुम्हारी पहचान मज़बूत होगी।

• किताब, कारोबार और रोज़गार ही आपकी असल पहचान होनी चाहिए—झगड़े नहीं।

• हर बार जवाब देना ज़रूरी नहीं, आपकी कामयाबी ही सबसे बड़ा जवाब होगी।

औरंगज़ेब की नहीं, अपनी तालीम की फ़िक्र करो।

जो नफ़रत फैला रहे हैं, उन्हें उनका काम करने दो—आप तरक़्क़ी की तरफ़ बढ़ो।

17 करोड़ से 123 करोड़ को लड़ाकर आपकी तरक़्क़ी रोकने की साज़िश हो रही है।

इल्म और रोज़गार ही आपका असली हथियार है।”**

आइए, इस नफ़रत की सियासत से बचें और अपनी असल ताक़त—इल्म, रोज़गार और तरक़्क़ी—को अपनी पहचान बनाएँ। यही मुल्क की ज़रूरत है, और यही मुसलमानों की असल जीत होगी।

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