वक्फ़ तरमीमी एक्ट, उम्मीद की आखिरी किरन है सुप्रीम कोर्ट

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(अज़ीज़ बर्नी)

अगर बाबरी मस्जिद पर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नज़र डालें तो ये किरन भी धुंधली नज़र आती है। लेकिन हुज्जत तमाम करना भी ज़रूरी है और उम्मीदों का दामन थामे रखना भी जरूरी है। यही उम्मीद राष्ट्रपति के दरवाज़े पर दस्तक देने की कोशिश भी थी जिसके लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए। हालांकि इस बिल पर राष्ट्रपति के दस्तख़त हो चुके हैं लिहाज़ा अब मुलाकात का कोई ख़ास मतलब नहीं है ताहम ये पेशरफ्त दुरुस्त थी।

 

अब रहा सवाल सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने का तो मेरी जानकारी के मुताबिक अब तक 10 याचिका दाखिल की जा चुकी हैं जिनमें जमातुल उलेमा ए हिंद (मौलाना अरशद मदनी) और और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी है। कल इस तादाद में और भी इज़ाफ़ा हो सकता है लेकिन जहां तक मैं समझता हूं इस तादाद के ज़्यादा होने से ज्यादा, संजीदा पेशरफ्त की जरूरत है। मैं किसी को भी गैर संजीदा क़रार नहीं दे सकता लेकिन ये जरूर कह सकता हूं कि मुस्लिम आवाम की इज्तेमाई तादाद जिसके हक़ में हो, उसे इंतेहा तक इस मुकदमे को लड़ना चाहिए भले ही इसमें वक्त लगे।

 

साथ ही मेरी राय है कि वक़्फ़ तरमीमी एक्ट के ताल्लुक से मुल्क भर में कॉन्फ्रेंस मुनक्किद की जाएं सेमिनार बुलाई जाएं और इनमें स्पीकर और शिरकत के लिए बुलाए जाने वाले अफ़राद में हिंदू,सिख जैन और ईसाई भी जरूर हों। कुछ ख़ास जगहों पर आवामी इजलास भी हों, जैसे दिल्ली रामलीला मैदान, मुंबई आज़ाद मैदान, कोलकाता पार्क सर्कस वगैरा वगैरा। जिससे कि देश भर में ये पैग़ाम जाए कि ये सिर्फ मुसलमानों का मामला नहीं है। कल दीगर माइनारटीज की जमीनें और इदारे भी जद में आ जा सकते हैं। हमें इस बात का ख्याल रखना है कि इस बिल की मुखालफत में लोकसभा में 232 मेंबरान ने वोट दिया था जिसमें सबसे बड़ी तादाद सेक्युलर पार्टियों के हिन्दू भाइयों की थी मुस्लिम नुमाइंदों से तो ये पूरी उम्मीद की जा सकती थी कि इस वक्फ़ तरमीमी बिल की मुखालफत में वोट दें लेकिन ये बहुत बड़ी बात है कि 232 मेंबरान और पंजाब के सभी 13 मेंबर पार्लियामेंट ने बिल की मुखालफत में वोट दिया लिहाज़ा हमारे सभी प्रोग्राम्स उनकी नुमाइंदगी जरूर हो।

 

इसके अलावा मेरी सभी मुस्लिम तंजीमों से ये अपील है कि उनकी जानिब से इन सभी 232 मेंबर पार्लियामेंट को एक एक शुक्रिया का खत (लैटर ऑफ थैंक्स) जरूर भेजा जाय और इन सभी पार्टीज़ के प्रेसिडेंट्स से हमारी तंजीमों का डेलिगेशन मुलाक़ात करे उनका शुक्रिया अदा करे और आगे भी इस लड़ाई में साथ देने की अपील करे। ये बहुत जरूरी है कि जिस शिद्दत से हम बिल की हिमायत में जाने वाले नीतीश कुमार, चंद्रा बाबू नायडू, चिराग़ पासवान और जयंत चौधरी की मुख्लफत कर रहे हैं उतनी ही शिद्दत के साथ उनकी तारीफ़ भी की जाय जो वक्त पर हमारे साथ खड़े रहे।

 

हमें ये भी याद रखना है कि पार्लियामेंट में जज़्बात से नहीं तादाद से लड़ाई जीती जाती है। इस लड़ाई में हम बहुत फासले पर नहीं थे बिल की हिमायत में 288 मेंबर थे और मुखालफत में 232 यानी सिर्फ़ 56 का फासला था फीसद के एतबार से देखें तो तकरीबन 55% सरकार के साथ थे और 45% बिल के खिलाफ वोट देने वाले इनमें से अगर 29 मेंबर आपके साथ आ जाते तो आपकी हिमायत में 261 मेंबर होते और सरकार के साथ 259 यानी बिल की मुखालफ़त में फैसला होता। इसे यूं समझा जा सकता है कि अगर सेक्युलर मेंबरान की तादाद 29 ज़्यादा होती तो ये वक्फ़ जायदाद पर सरकार की मंशा पूरी नहीं होती। नीतीश कुमार चंद्रा बाबू नायडू चिराग़ पासवान और जयंत चौधरी से नाराज़ होने की सबसे बड़ी वजह यही है कि उन्होंने जाती वजूहात की बिना पर मुसलमानों का साथ नहीं दिया संविधान में बराबरी के हुक़ूक़ का साथ नहीं दिया।

 

एक और बात कह कर मैं अपनी ये तहरीर ख़त्म करना चाहूंगा। जिक्र में सिर्फ़ एक का कर रहा हूं लेकिन इसे कुल हिंदुस्तान में सरकार के पसंदीदा लोगों से जोड़ कर देखें ये हिन्दू और मुसलमान का मामला नहीं है, पसंद और ना पसंद का मामला है। मुकेश अंबानी का घर एंटीलिया वक्फ़ की ज़मीन पर है, यतीमखाने की ज़मीन पर है ।ये आज की मिसाल है कल सैकड़ों अंबानियों के घर और कारोबार ऐसी जगहों पर हो सकते हैं और अगर इसी तरह यानि मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड की तर्ज पर दीगर माइनारटीज के मजहबी इख्तियारात भी छीने गए तो गुरद्वारों और चर्च की जमीनों पर भी आंच आ सकती है जिस तरह यहां गैर मुस्लिम नुमाइंदों की बात की गई है वहां गैर सिख और गैर ईसाई नुमाइंदों की बात भी हो सकती है।

-अज़ीज़ बर्नी उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं

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