विदेशी हैकर ग्रुप से लेकर चुनाव आयोग की साख तक-मतदाता के यक़ीन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती

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                (रईस खान)

चुनाव लोकतंत्र की रूह है और चुनाव आयोग उसकी हिफ़ाज़त का सबसे बड़ा रखवाला। मगर आज एक बार फिर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में सवाल उठाकर माहौल गर्म कर दिया कि आख़िर कौन हैं वो लोग जो संदिग्ध सॉफ़्टवेयर के ज़रिए मतदाता सूची से नाम जोड़ते और हटाते हैं। यह इल्ज़ाम सीधे तौर पर चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर चोट करता है और जनमानस के मन में शक के बादल गहराने लगते हैं।

दुनिया भर में चुनावी हस्तक्षेप की कहानियाँ नई नहीं हैं। ब्रिटिश अख़बार द गार्डियन ने 2023 में एक स्टिंग ऑपरेशन कर ‘टीम जॉर्ज’ नामक इस्राइली साइबर यूनिट का पर्दाफ़ाश किया था, जिसका मुखिया ताल हनान है। यह यूनिट अपने सॉफ़्टवेयर AIMS के ज़रिए हज़ारों फर्ज़ी प्रोफ़ाइल बनाकर अफ़वाह फैलाने और जनमत को मोड़ने का दावा करती है। बताया जाता है कि उसने तीस से ज़्यादा राष्ट्रपति स्तर के चुनावों में दख़ल दिया। हाल ही में OpenAI ने भी यह बताया कि एक और इस्राइली कम्पनी STOIC ने भारत में ऑनलाइन कैंपेन छेड़ने की कोशिश की थी, जिसमें बीजेपी के ख़िलाफ़ और कांग्रेस के पक्ष में नैरेटिव फैलाने का प्रयास हुआ। हालाँकि यह अभियान शुरुआती दौर में ही पकड़ लिया गया और रोक दिया गया, लेकिन सवाल यही है कि जब तकनीकी दख़ल इतनी आसानी से हो सकती है तो लोकतंत्र की बुनियाद कितनी महफ़ूज़ है ?

भारत में चुनाव आयोग पर पहले भी इल्ज़ाम लगते रहे हैं। 2019 के आम चुनाव के दौरान विपक्ष ने कहा कि आयोग आचार संहिता उल्लंघन पर प्रधानमंत्री और सत्ताधारी दल के नेताओं के मामले में नरम रहा। बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में भी आयोग पर पक्षपात के आरोप लगे। आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में हाल ही में हुआ बदलाव भी बहस का मुद्दा बना है। पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नियुक्ति पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए, लेकिन संसद द्वारा पास किए गए नए कानून ने सरकार को फिर से निर्णायक भूमिका दे दी। इससे यह डर और गहरा हो गया कि कहीं आयोग हुकूमत का साया तो नहीं बन रहा ?

मुद्दा सिर्फ़ विदेशी हस्तक्षेप या तकनीकी साज़िश का नहीं है, असली सवाल भरोसे का है। बैलेट पेपर के ज़माने में धांधली खुली आँखों से दिखाई देती थी, गड्डियाँ भरकर डाल दी जाती थीं या बूथ कैप्चर कर लिया जाता था। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ने उस दौर का अंत किया, लेकिन अब शक मशीन की अदृश्यता पर है। वोटर वेरिफ़ायबल पेपर ट्रेल यानी VVPAT एक राहत है, जिसमें मतदाता अपनी आँखों से देख सकता है कि उसका वोट सही जगह गया, लेकिन गिनती सिर्फ़ चुनिंदा बूथों पर होती है। जबतक यह प्रक्रिया पूरी तरह से सार्वभौमिक नहीं होगी, तबतक शुबहा बना रहेगा।

भारत जैसे बड़े मुल्क में चुनाव कई चरणों में होते हैं। सुरक्षा बलों की कमी और प्रशासनिक चुनौतियों का यह नतीजा है। लेकिन लंबे चुनावी दौर में हवा बनाने का खेल और ज़्यादा आसान हो जाता है। पहले चरण के बाद का माहौल बाक़ी इलाकों के वोटरों पर असर डाल सकता है। सोशल मीडिया पर चलाए जाने वाले अभियान धीरे-धीरे पूरे देश में फैलते हैं और मतदाता के फ़ैसले को प्रभावित कर सकते हैं।

आज ज़रूरत इस बात की है कि चुनावी प्रक्रिया पर यक़ीन फिर से क़ायम किया जाए। इसके लिए आयोग की नियुक्ति को पूरी तरह पारदर्शी बनाना होगा, वोटर लिस्ट को बायोमेट्रिक से जोड़ना होगा, सोशल मीडिया और फर्ज़ी खबरों पर सख़्त नज़र रखनी होगी और चुनावों को कम से कम समय में मुकम्मल करना होगा। विदेशी कंपनियों के ज़रिए फैलाए गए डिसइन्फ़ॉर्मेशन को रोकने के लिए टेक्नोलॉजी और क़ानून दोनों का इस्तेमाल ज़रूरी है।

राहुल गांधी के आरोप हों या अंतरराष्ट्रीय मीडिया के खुलासे, ये सब मिलकर हमें यह बताते हैं कि लोकतंत्र सिर्फ़ वोट डालने का नाम नहीं है, बल्कि इस पर भरोसा होना ज़्यादा अहम है। अगर जनता को यह लगे कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी है या आयोग सरकार के इशारे पर काम कर रहा है, तो लोकतंत्र की नींव हिल जाएगी। आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है,जनता को यह यक़ीन दिलाना कि उनका वोट वाक़ई उनकी ताक़त है और उस ताक़त को कोई हैक, कोई प्रोपेगंडा और कोई सॉफ़्टवेयर नहीं छीन सकता।

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