गरीबों का दर्द बाँटने वाले सर्जन की अनकही दास्ताँ

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 (रईस खान)

मालेगाँव की तंग गलियों में एक ऐसा नाम है जो आज भी हर मरीज के दिल में बसता है, डॉ. सईद अहमद फारानी। 67 साल की उम्र में भी ये साहब जैसे जवान हैं, जिनकी आँखों में हमदर्दी की चमक और हाथों में सर्जरी की जादूगरी है।

बचपन और तालीम

डॉ. फारानी का जन्म 6 नवंबर 1958 को मालेगाँव में ही हुआ। उनके बाप-दादा आजमगढ़ (यूपी) से थे, लेकिन अब ये शहर ही उनका असली वतन है। बचपन से ही पढ़ाई में तेज थे। म्यूनिसिपल प्राइमरी स्कूल से शुरुआत की, फिर मुंबई के एल्फिन्स्टन कॉलेज से इंटरमीडिएट। मेडिकल की दुनिया में कदम रखा टोपिवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज और नायर हॉस्पिटल से। वहाँ से एमबीबीएस और एमएस की डिग्री हासिल की, एमएस 1989 में। पढ़ाई के दौरान थिएटर का शौक हुआ। उन्होंने गुजराती नाटक ‘चित्कार’ लिखा, जो मेंटल हेल्थ पर था और खूब सराहा गया। डॉक्टर बनने से पहले स्टेज पर चमके, लेकिन दिल ने कहा, मरीजों की सेवा ही असली आर्ट है।

प्रोफेशनल जर्नी की शुरुआत

मुंबई में एक साल प्रैक्टिस की, लेकिन 1991 में मालेगाँव लौट आए। क्यों? क्योंकि यहाँ हॉस्पिटल की कमी थी, बस, फारान हॉस्पिटल खोल दिया ओल्ड आगरा रोड पर। आज 30 साल बाद ये हॉस्पिटल शहर का सबसे बड़ा नाम है। डॉ. साहब जनरल सर्जन हैं, जो किडनी स्टोन, वैरिकोज वेन्स, डायबिटिक फुट अल्सर, कार्पल टनल, हिप-नी रिप्लेसमेंट जैसी सर्जरी करते हैं। इमरजेंसी में तो कमाल हैं, एक्टोपिक प्रेग्नेंसी, मिसकैरेज, ब्रेस्ट सर्जरी सब संभालते हैं। गरीबों के लिए हमदर्द डॉक्टर कहते हैं, “इलाज कमाई का धंधा नहीं, इंसानियत का फर्ज है।”

सोशल वर्क का जलवा

सोशल वर्क में तो डॉ. फारानी का अलग नाम है। 2002 के दंगों में जब सब डर गए, उन्होंने हॉस्पिटल में घायलों का इलाज किया, ऑर्थोपेडिक टूल्स न होने पर भी बेहतरीन इलाज किया। 2006 और 2008 के मालेगाँव बम ब्लास्ट में मुफ्त सर्विस दी, जबकि बाकी डॉक्टर हिचकिचा रहे थे। कोरोना काल में ‘योद्धा’ बने, मरीजों को घर-घर जाकर मदद की।

वह उर्दू किताब मेलों में हजारों किताबें खरीदकर शिक्षा को बढ़ावा देते हैं। उनका बेटा डॉ. अवैस फारानी भी एमडी जनरल मेडिसिन हैं, डीवाई पाटिल हॉस्पिटल से, खानदान की विरासत चली।

फेहरिस्त अवॉर्ड की 

अवॉर्ड्स की बात करें तो लिस्ट लंबी है। 2002 में महात्मा गांधी पीस अवॉर्ड, 2006 में मदर टेरेसा अवॉर्ड फॉर सोशल जस्टिस, 2007 में खादिम-ए-खल्क, 2008 में नासिक गौरव, 2011 रोटरी क्लब, 2012 लायंस क्लब, 2013 मुंबई रतन, 2014 पुलिस रेजिंग डे, और 2022 में कोरोना योद्धा अवॉर्ड। मालेगाँव के पत्रकार कहते हैं, “डॉ. साहब शहर के सच्चे गौरव हैं।”

बुलंद सोच 

आज भी डॉ. फारानी हॉस्पिटल को बड़ा करने की सोचते हैं, लेकिन गरीबों की मदद कभी नहीं छोड़ेंगे। उनकी जिंदगी सिखाती है, डॉक्टरी सिर्फ डिग्री नहीं, दिल की धड़कन है। अगर आप मालेगाँव जाएँ, तो फारान हॉस्पिटल जरूर देखें। स्वस्थ रहें, और डॉ. साहब जैसे मसीहाओं का सम्मान करें।

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