(रईस खान)
रमज़ान के पाक महीने में ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच छिड़ी जंग अब तीसरे दिन में दाखिल हो चुकी है। ईरान पर दशकों से लगे प्रतिबंधों के बावजूद, वो लगातार अपनी हिम्मत और आत्मनिर्भरता से खड़ा रहा है। इज़राइल और अमेरिका की तरफ से उसके वैज्ञानिकों और आला अफसरों को मारने की कोशिशें हुईं, लेकिन ईरान ने कभी झुकना कबूल नहीं किया। पिछली जंगों में भी, जैसे 2024 की अप्रैल और अक्टूबर की लड़ाई में, ईरान ने जवाबी हमले किए लेकिन बातचीत से मसला हल करने की कोशिश की। अब इस बार इज़राइल ने धोखे से हमला करके कई बड़े लोगों को शहीद कर दिया, लेकिन ईरान अमेरिकी अड्डों, इज़राइल और समुद्री इलाकों पर हमले जारी रखे हुए है। उसके नुकसान भी हो रहे हैं, लेकिन वो डटा हुआ है। सवाल ये है कि ये जंग आखिर किस अंजाम को पहुंचेगी? क्या ईरान की हुकूमत गिर जाएगी, या ये और फैलेगी?
प्रतिबंधों की दास्तान: ईरान की मुश्किलें और जज्बा
ईरान पर अमेरिका के प्रतिबंध 1979 से शुरू हुए, जब इरानी स्टूडेंट्स ने अमेरिकी एम्बेसी पर कब्जा किया और होस्टेज बनाए। ये सैंक्शंस ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम, टेररिज्म सपोर्ट और ह्यूमन राइट्स अब्यूज के नाम पर लगाए गए। 1995 में क्लिंटन ने इनको और सख्त किया, तेल और गैस सेक्टर पर रोक लगाई। 2015 में ओबामा के वक्त जेसीपीओए डील हुई, जिसमें सैंक्शंस हटे, लेकिन 2018 में ट्रंप ने डील तोड़ी और मैक्सिमम प्रेशर पॉलिसी अपनाई। ईरान की इकॉनमी पर बुरा असर पड़ा , तेल एक्सपोर्ट गिरा, इंफ्लेशन बढ़ा, लेकिन ईरान ने आत्मनिर्भर बनने की कोशिश की। वो इंपोर्ट सब्स्टिट्यूशन पर फोकस किया, डिफेंस और इंडस्ट्री में लोकल प्रोडक्शन बढ़ाया। आज ईरान अपनी मिसाइल्स, ड्रोन्स और न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी में काफी आगे है, सैंक्शंस के बावजूद। रेजिस्टेंस इकॉनमी पॉलिसी से वो लोकल इंडस्ट्री को बूस्ट दे रहा है।
वैज्ञानिकों की शहादत: इज़राइल-अमेरिका की साजिशें
ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को रोकने के लिए इज़राइल और अमेरिका ने कई वैज्ञानिकों को निशाना बनाया। 2010 से 2020 तक मोसाद ने कई असासिनेशंस किए, जैसे मोहसिन फख्रीजादेह को 2020 में मार डाला। ईरान ने इज़राइल को दोष दिया, लेकिन अमेरिका ने इनकार किया। 2025 की जंग में इज़राइल ने 9 बड़े साइंटिस्ट्स को मार डाला, जैसे फेरेदून अब्बासी और मोहम्मद मेहदी तहरांची। ये लोग ईरान के न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम के पिलर थे। ईरान कहता है कि ये हमले धोखे से हुए, लेकिन उसके वैज्ञानिकों का जज्बा कम नहीं हुआ। वो कहते हैं कि नॉलेज तो बाकी है, नए लोग आएंगे।
पिछली जंगों में ईरान की दृढ़ता
2023-2024 में इजराइल-ईरान टेंशन्स बढ़े। ऑक्टोबर 2023 में हमास के अटैक के बाद ईरान के साथी ग्रुप्स जैसे हिज्बुल्लाह और हूती ने इजराइल पर हमले किए। अप्रैल 2024 में इजराइल ने दमिश्क में ईरानी कंसुलेट पर हमला किया, ईरान ने जवाब में 300 ड्रोन्स और मिसाइल्स दागीं। अक्टूबर 2024 में फिर डायरेक्ट स्ट्राइक्स हुए। ईरान ने पीछे हटने का कोई इरादा नहीं दिखाया, लेकिन बातचीत से रुकावट आई। 2025 की जून में 12 दिनों की जंग में इजराइल ने ईरान के न्यूक्लियर साइट्स पर हमले किए, लेकिन ईरान ने जवाब दिया। अब रमज़ान में ये जंग छिड़ी है, ईरान अमेरिकी बेसों पर हमले कर रहा है, जैसे कतर, बहरीन में। उसके नुकसान हो रहे हैं, लेकिन वो डटा हुआ है।
ये जंग किस अंजाम को पहुंचेगी?
इस जंग का अंजाम मुश्किल है। अगर एस्केलेट हुई, तो रूस-चीन ईरान की मदद में कूद सकते हैं, और ये ग्लोबल वॉर बन सकती है। अमेरिका-इजराइल रिजीम चेंज चाहते हैं, लेकिन ईरान की आर्मी मजबूत है, और वो मिसाइल्स से बड़ा नुकसान कर सकता है। अगर ईरान हारा, तो रीजन में अराजकता फैलेगी, जैसे इराक में हुई। ईरान न्यूक्लियर वेपन्स बना सकता है, जो और खतरा बढ़ाएगा। लेकिन डी-एस्केलेशन की उम्मीद है, अगर ट्रंप डायलॉग से मसला हल करें। मुस्लिम मुल्कों को एकजुट होकर शांति की अपील करनी चाहिए। ईरान की दिलेरी इतिहास में याद रहेगी, लेकिन जंग किसी के हक में नहीं। रमज़ान का महीना अमन का होना चाहिए, न कि खून का।

