(रईस खान)
मुंबई और महाराष्ट्र की 28 नगरपालिकाओं में कल 15 जनवरी को होने वाले चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प और निर्णायक माने जा रहे हैं। खास तौर पर मुंबई में मुस्लिम वोटर इस चुनाव का रुख तय करने वाली ताकत बनकर उभरे हैं। मुंबई की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी करीब 20 से 25 प्रतिशत मानी जाती है और शहर के कई इलाकों में यह अनुपात इससे भी ज्यादा है। ऐसे में जब बड़े राजनीतिक गठबंधन टूट चुके हैं और मुकाबला कई तरफ से हो रहा है, तब मुस्लिम मतदाता करीब 90 से ज्यादा वार्डों में नतीजा पलटने की स्थिति में हैं।
बीएमसी, जिसका बजट 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है, पिछले कई साल से प्रशासक के अधीन चल रही थी और अब पहली बार इतने बड़े पैमाने पर सियासी परीक्षा हो रही है। मैदान में बीजेपी, शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी वाला महायुति गठबंधन है, तो दूसरी ओर उद्धव ठाकरे की शिवसेना, राज ठाकरे की एमएनएस और शरद पवार की एनसीपी की तरफ से बना नया धड़ा है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एआईएमआईएम और कई निर्दलीय भी अपने-अपने दम पर लड़ रहे हैं।
मुस्लिम बहुल इलाकों जैसे मुम्बादेवी, मानखुर्द-शिवाजीनगर, भायखला और मालवणी में माहौल इस बार थोड़ा बदला हुआ दिख रहा है। पहले जहां मुस्लिम वोट बड़े पैमाने पर बीजेपी को रोकने के लिए एकजुट होकर एक ही तरफ जाता था, अब वह कई हिस्सों में बंटता दिख रहा है। हाल के सर्वे बताते हैं कि लगभग 41 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता कांग्रेस की तरफ झुक रहे हैं, करीब 28 प्रतिशत उद्धव-एमएनएस गठबंधन को देख रहे हैं और करीब 11 प्रतिशत महायुति की ओर भी जा रहे हैं। यानी पहले जैसी पूरी एकजुटता अब नहीं दिख रही। कई जगहों पर लोग सड़कों, सफाई, पानी, मकान और रोजगार जैसे स्थानीय मुद्दों को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं।
इस बीच एआईएमआईएम और समाजवादी पार्टी जैसे मुस्लिम केंद्रित दलों ने भी अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश की है। एआईएमआईएम ने मुस्लिम इलाकों में दर्जनों उम्मीदवार उतारे हैं और वह कह रही है कि मुस्लिमों को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनानी चाहिए। अनुमान है कि वह इस बार 5 से 10 सीटें जीत सकती है। समाजवादी पार्टी भी उत्तर भारतीय और उर्दू भाषी मुस्लिमों में पैठ बनाकर 10 से 15 वार्डों में अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद कर रही है। लेकिन जानकारों का कहना है कि इन दोनों के आने से मुस्लिम वोट बंट सकता है, जिसका फायदा बीजेपी गठबंधन को भी मिल सकता है।
अगर मुस्लिम वोट का असर देखा जाए तो सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को होता दिख रहा है। उसे मुस्लिम इलाकों में मजबूत समर्थन मिल रहा है और वह 30 से 40 सीटों तक पहुंच सकती है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना और एमएनएस को भी कुछ इलाकों में मुस्लिम समर्थन मिल रहा है, खासकर जहां मराठी और मुस्लिम आबादी दोनों अच्छी संख्या में हैं। दूसरी तरफ बीजेपी और उसका गठबंधन मुस्लिम इलाकों में कमजोर नजर आ रहा है, क्योंकि बीजेपी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा और हालिया बयानबाजी से भी नाराजगी बनी है।
लगभग सभी पार्टियों ने मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए अलग-अलग तरह के वादे किए हैं। कांग्रेस ने छात्रवृत्ति और स्लम सुधार की बात की है, शिंदे गुट ने अल्पसंख्यक लड़कियों की शिक्षा जैसी योजनाएं गिनाई हैं, एनसीपी ने उर्दू स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं के वादे किए हैं, जबकि एआईएमआईएम और सपा सीधे मुस्लिम सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं। बीजेपी ने खुलकर कोई खास वादा नहीं किया, बल्कि “सबका साथ, सबका विकास” की लाइन पर ही बात रखी है।
कुल मिलाकर चुनाव बहुत कांटे का लग रहा है। सर्वे बता रहे हैं कि किसी भी गठबंधन को साफ बहुमत नहीं मिलेगा और मुस्लिम वोट का बंटवारा या एकजुटता कई सीटों का फैसला कर सकती है। मुंबई के कई मुस्लिम इलाकों में इस बार मतदान ज्यादा होने की उम्मीद है और लोग कह रहे हैं कि उनके लिए धर्म से ज्यादा जरूरी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दे हैं। अब 16 जनवरी को आने वाले नतीजे बताएंगे कि मुस्लिम वोट किस तरफ गया और मुंबई की सत्ता की चाबी किसके हाथ लगी।

