कुरआन का मक़सद: सोचने और समझने की दावत

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(रईस खान)

सूरह यासीन की आयतें (33- 40) इंसान को अल्लाह की क़ुदरत की निशानियों पर गौर करने के लिए बुलाती हैं। इसमें साइंस की किताब की तरह फार्मूले नहीं हैं, बल्कि क़ुदरत के ऐसे सच बताए गए हैं, जिन पर आज का विज्ञान भी मुहर लगाता है।

मुर्दा ज़मीन का ज़िंदा होना

कुरआन कहता है कि अल्लाह मरी हुई ज़मीन को ज़िंदा करता है और उससे अनाज निकालता है। आज साइंस बताती है कि मिट्टी बाहर से सूखी और बेजान लगती है, लेकिन उसके अंदर लाखों सूक्ष्म जीव होते हैं। जब पानी मिलता है, तो वही मिट्टी फसल उगाने लगती है।

साइंटिस्ट मानते हैं कि ज़मीन का यह “मुर्दा से जीवित होना” एक नैचुरल सिस्टम है, जिसे कुरआन ने बहुत आसान लफ्ज़ों में बयान कर दिया।

रात और दिन का आना-जाना

कुरआन में बताया गया है कि रात, दिन से निकलती है। आज साइंस कहती है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, इसलिए कहीं दिन होता है और कहीं रात।

फ्रांस के मशहूर साइंटिस्ट मॉरिस बुकले ने लिखा कि कुरआन का यह बयान बताता है कि ज़मीन रुकी हुई नहीं, बल्कि हरकत में है, जबकि पुराने ज़माने में लोग ज़मीन को स्थिर मानते थे।

सूरज का चलना 

कुरआन कहता है कि सूरज एक तय रास्ते पर चल रहा है।

आधुनिक खगोल विज्ञान साफ़ कहता है कि सूरज बिल्कुल स्थिर नहीं है। वह अपनी पूरी सोलर सिस्टम के साथ मिल्की वे गैलेक्सी में एक मुक़र्रर रास्ते पर तेज़ी से चल रहा है। साइंटिस्ट मानते हैं कि 1400 साल पहले सूरज की “मूवमेंट” का ज़िक्र होना अपने आप में हैरत की बात है।

चाँद की मंज़िलें

कुरआन चाँद की अलग-अलग मंज़िलों यानी शक्ल बदलने का ज़िक्र करता है। आज हम जानते हैं कि चाँद कभी पूरा, कभी आधा, कभी पतला इसलिए दिखता है क्योंकि वह पृथ्वी के चारों ओर घूमता है।

इस्लामी कैलेंडर भी चाँद की इन्हीं मंज़िलों पर चलता है, जिसे साइंस एक सटीक नैचुरल टाइम सिस्टम मानती है।

सूरज, चाँद और ब्रह्मांड का संतुलन

कुरआन कहता है कि न सूरज चाँद से टकरा सकता है और न रात दिन से आगे बढ़ सकती है। सब अपने-अपने दायरे में चल रहे हैं। आज साइंस इसे ग्रैविटी और ऑर्बिट सिस्टम कहती है।

साइंटिस्ट मानते हैं कि अगर इस संतुलन में ज़रा सा भी फर्क आ जाए, तो पूरी कायनात का सिस्टम बिगड़ सकता है।

साइंटिस्ट कुरआन के बारे में क्या कहते हैं

मॉरिस बुकले जैसे साइंटिस्ट साफ़ कहते हैं कि कुरआन साइंस की किताब नहीं है, लेकिन उसमें लिखी क़ुदरत की बातें आधुनिक साइंस से टकराती नहीं हैं। उनका कहना था कि कुरआन में ऐसे बयान हैं, जिन्हें सातवीं सदी का कोई इंसान अपने दम पर नहीं जान सकता था।

सूरह यासीन की आयतें 33 से 40 ज़मीन, रात-दिन, सूरज और चाँद के ज़रिये इंसान को यह पैग़ाम देती हैं कि यह सब कुछ अपने आप नहीं चल रहा, बल्कि एक बहुत बड़ी हिकमत और ताक़त के तहत चल रहा है। साइंस बताती है कैसे होता है,और कुरआन इंसान से पूछता है किसने बनाया और चलाया।

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