(शिब्ली रामपुरी)
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में बीएमसी चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी के प्रत्याशियों ने जिस तरह से कई बड़े दिग्गज नेताओं का मुकाबला किया और उन्होंने अच्छे खासे वोट भी हासिल किए तो कई सीटों पर एमआईएम को कामयाबी भी मिली है जिससे असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी के नेताओं के चेहरे पर खुशी झलक रही है और पार्टी में एक नए जोश का संचार हो चुका है.
ये कहना गलत नहीं होगा कि निकाय चुनावों में यह उभार आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है. उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने जा रहा है और इसको लेकर अभी से सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी-अपनी तैयारी तेज कर दी हैं. यूपी देश का सबसे बड़ा राज्य है और मशहूर कहावत है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है तो ऐसे में उत्तर प्रदेश में जो विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं उसमें असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी इस बार पहले से भी ज्यादा मजबूती के साथ और अधिक सीटों पर चुनावी मुकाबला करने की तैयारी कर चुकी है.
बताया जाता है कि असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में कई राजनीतिक पार्टियों से गठबंधन करना चाहते हैं हालांकि यह प्रयास उनकी ओर से पूर्व में भी कई चुनाव में किया जा चुका है लेकिन ना तो उनसे समाजवादी पार्टी गठबंधन करती है और ना ही बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में उनके साथ आना चाहती है लेकिन जिस तरह से बिहार के बाद महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया है तो उससे यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि अब पॉलिटिक्स में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को नजरअंदाज करना कठिन होता जा रहा है. ओवैसी की पार्टी एमआईएम एक ऐसी पार्टी बन चुकी है कि जिसके उम्मीदवार कितने जीतेंगे इससे ज्यादा नजर इस बात पर टिकी रहती है कि एमआईएम के उम्मीदवार चुनावी मैदान में होने से किस सेकुलर पार्टी को कितना ज्यादा नुकसान होता है और भारतीय जनता पार्टी को इसका कितना लाभ मिलता है इस पर हमेशा से चुनावी माहौल पर जनता की नजर रहती है. जो राजनीतिक पार्टियों खुद को सेकुलर कहती हैं वह असदुद्दीन ओवैसी की वजह से कई जगहों पर चुनावी पराजय का मुंह भी काफी समय से देखते आ रही हैं लेकिन शायद वह किसी भी चुनाव में ओवैसी की पार्टी के साथ गठबंधन करने से इसलिए घबराती हैं कि कहीं उनका वोट बैंक इधर-उधर ना खिसक जाए.

