(रईस खान)
कुरआन पाक में सूरह अल-इसरा (जिसे सूरह बनी इसराइल भी कहते हैं) की पहली आयत शब-ए-मेराज के बारे में बताती है। यह आयत है: “पाक है वो ज़ात (अल्लाह) जिसने अपने बंदे (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को रात के एक हिस्से में मस्जिद-ए-हराम (मक्का) से मस्जिद-ए-अक़्सा (यरूशलम) तक की सैर कराई, जिसके आसपास हमने बरकतें दी हैं, ताकि हम उसे अपनी कुछ निशानियां दिखाएं। बेशक, वो सब कुछ सुनने वाला और देखने वाला है।” (सूरह अल-इसरा: 1)
शब-ए-मेराज वो मुकद्दस रात है जब पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अल्लाह ने ज़मीन से आसमानों तक की सैर कराई। पहले हिस्से को ‘इसरा’ कहते हैं , और दूसरे को ‘मेराज’ (आसमानों तक का सफर)। यह घटना इस्लाम में एक बड़ा मोजिज़ा है, लेकिन कुछ लोग पूछते हैं कि क्या यह साइंटिफिकली मुमकिन है? मुस्लिम साइंटिस्ट्स और थिंकर्स ने रिसर्च से इसकी तफ़सीर की है, जहां कुरआन को मॉडर्न साइंस से जोड़ा जाता है। ध्यान रखें, यह तफ़सीरें साइंस की मदद से फेथ को मज़बूत करती हैं, लेकिन इस्लाम को साइंस की ज़रूरत नहीं, अल्लाह की कुदरत सबसे ऊपर है।
1. रिलेटिविटी थ्योरी से सफर की स्पीड समझना
मुस्लिम रिसर्चर्स जैसे फरीद अहमद और अन्य ने अल्बर्ट आइंस्टीन की ‘स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी’ से मेराज को समझाया है। इस थ्योरी के मुताबिक, वक्त और जगह रिलेटिव हैं, मतलब, जो चीज़ तेज़ चलती है, उसके लिए वक्त धीमा हो जाता है। अगर कोई लाइट की स्पीड (3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड) के करीब चले, तो उसके लिए वक्त रुक-सा जाता है।
शब-ए-मेराज में पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ‘बुराक’, एक खास सवारी, जो बिजली जैसी तेज़ है, पर सफर किया। साइंटिस्ट्स कहते हैं कि यह लाइट स्पीड जैसा था, इसलिए मक्का से यरूशलम करीब 1500 किलोमीटर, का सफर कुछ सेकंड्स में हो गया, जैसे CERN के पार्टिकल एक्सेलरेटर में कण तेज़ चलते हैं। आसमानों तक का सफर लाखों साल का लगता है, लेकिन रिलेटिविटी से समझ आता है कि पैगंबर के लिए वो रात का एक हिस्सा ही था। जैसे, अगर कोई स्पेसशिप तेज़ चले, तो उसमें बैठे इंसान के लिए साल बीतते हैं,लेकिन ज़मीन पर हज़ारों साल गुज़र जाते हैं। कुरआन में भी ऐसी हिंट है, जैसे सूरह अल-हज: 47 में “अल्लाह के पास एक दिन तुम्हारे हज़ार साल जैसा है।” यह तफ़सीर शक व सुबहा को दूर करती है कि सफर कैसे इतनी जल्दी हुआ।
2. ज़ीरो केल्विन थ्योरी से बॉडी का ट्रांसफॉर्मेशन
रहमति जैसे मुस्लिम रिसर्चर्स ने ‘ज़ीरो केल्विन’ थ्योरी (absolute zero तापमान, -273 डिग्री सेल्सियस) से आयत की तफ़सीर की है। इस थ्योरी में, इतने ठंडे तापमान पर एटम्स की मूवमेंट रुक जाती है, और क्वांटम फिज़िक्स (Heisenberg का principle) से चीज़ें कहीं भी मौजूद हो सकती हैं, जैसे सुपरहीरो की तरह।
मेराज से पहले, फरिश्ते जिब्रील अलैहिस्सलाम ने पैगंबर की छाती खोली, ज़मज़म से धोया और हिकमत से भरा। साइंटिस्ट्स कहते हैं यह बॉडी को ‘नूरानी’ (लाइट जैसी) बनाने का तरीका था, ताकि स्पीड ऑफ लाइट पर सफर सहन हो सके। नॉर्मल बॉडी टूट जाती, लेकिन यह ‘सुपर-बीइंग’ बना देता है। यह थ्योरी डाउट सॉल्व करती है कि क्या सफर बॉडी से था या सिर्फ रूह से? दोनों, क्योंकि ज़ीरो केल्विन पर बॉडी स्पेस-टाइम में कहीं भी जा सकती है, बिना टूटे।
3. हार्ट प्यूरिफिकेशन का साइंटिफिक एनालिसिस
इस्लाम हैशटैग जैसे सोर्सेज़ में, जिब्रील अलैहिस्सलाम की ‘सर्जरी’ को मॉडर्न हार्ट सर्जरी से जोड़ा गया है। पैगंबर की छाती खोलकर, दिल और पेट को ज़मज़म से धोया और ईमान-हिकमत से भरा। यह लेज़र सर्जरी जैसा था, बिना दर्द के, और एडवांस्ड। आज की साइंस में भी लेज़र से इलाज होता है, लेकिन तब इतना एडवांस्ड नहीं था। यह बॉडी को स्पेस ट्रैवल के लिए तैयार करता है, क्योंकि नॉर्मल बॉडी हाई स्पीड पर झेल नहीं सकती। क्वांटम फिज़िक्स से, यूनिवर्स में एनर्जी और मैटर एक हैं, इसलिए बॉडी को ‘लाइट बॉडी’ में बदलना मुमकिन लगता है।
4. वर्महोल्स और ब्लैक होल्स से स्पेस शॉर्टकट
कुछ तफ़सीरोंमें,’सिदरा-तुल-मुंतेहा’ मेराज के आखिरी पॉइंट, को ब्लैक होल या वर्महोल से जोड़ा गया है। वर्महोल स्पेस-टाइम को फोल्ड करता है, जैसे पेपर फोल्ड करके दूर की जगहें करीब आ जाती हैं। आइंस्टीन-रोसेन ब्रिज (वर्महोल) से, मक्का से यरूशलम या आसमानों तक शॉर्टकट मुमकिन। ब्लैक होल में ग्रैविटी इतनी तेज़ कि वक्त रुक जाता है, मेराज में पैगंबर ने पानी का गिरता गिलास पकड़ा, मतलब ज़मीन पर वक्त नहीं गुज़रा। सूरह अन-नज्म से, साइंटिस्ट्स ब्लैक होल्स को कुरआन से लिंक करते हैं।
5. क्या यह फिज़िकल था या स्पिरिचुअल?
कुछ मुस्लिम थिंकर्स जैसे जावेद गामिदी या अन्य कहते हैं कि इस्रा फिज़िकल था,लाइट स्पीड से, लेकिन मेराज आउट-ऑफ-बॉडी एक्सपीरियंस जैसा, जहां रूह सफर करती है, बॉडी सोती रहती है। रिलेटिविटी से, वक्त की वैरिएबिलिटी (बदलाव) इसे साबित करती है। सईद नुरसी जैसे स्कॉलर्स कहते हैं कि स्पिरिट की स्पीड लाइट से तेज़ है, इसलिए मुमकिन।
अंत में, ये तफ़सीरें दिखाती हैं कि कुरआन 1400 साल पहले की किताब है, लेकिन मॉडर्न साइंस से मैच करती है। मुस्लिम साइंटिस्ट्स जैसे रहमति, फरीद और अन्य रिसर्च से बताते हैं कि मेराज अल्लाह का मोजिज़ा है, जो साइंस की लिमिट्स से ऊपर है। लेकिन साइंस की थ्योरीज़ (रिलेटिविटी, ज़ीरो केल्विन, वर्महोल्स) डाउट दूर करती हैं। बेशक, अल्लाह सबसे बड़ा है, फेथ साइंस से पहले आती है।

