ज़कात मैनेजमेंट, चुनौतियां व सुधार

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(रईस खान)

रमजान का पाक महीना आते ही पूरे देश में इबादत के साथ साथ खैरात और जकात का सिलसिला भी तेज हो जाता है। करोड़ों मुसलमान अपनी सालाना बचत का ढाई प्रतिशत हिस्सा जकात के तौर पर निकालते हैं ताकि गरीबों, जरूरतमंदों, यतीमों और कर्जदारों की मदद हो सके। अंदाजा लगाया जा रहा है कि रमजान 2026 में भारत भर में दस हजार करोड़ से लेकर चालीस हजार करोड़ रुपये तक की जकात जमा हो सकती है। लेकिन इतना बड़ा अमाउंट आखिर कहां जा रहा है, किसको मिल रहा है और कितना असर पैदा कर रहा है, यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

भारत में जकात का कोई केंद्रीय सरकारी सिस्टम नहीं है।ज्यादातर जकात मस्जिदों, मदरसों और अलग अलग चैरिटेबल संगठनों के जरिए जमा की जाती है। बड़े शहरों में कुछ नामी संस्थाएं जैसे जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया और इस्लामिक रिलीफ इंडिया ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए फंड जमा करती हैं और अपनी रिपोर्ट भी जारी करती हैं। लेकिन देश के बड़े हिस्से में खासकर छोटे शहरों और गांवों में जकात का कलेक्शन व्यक्तिगत भरोसे पर होता है जहां लिखित रिकॉर्ड या ऑडिट की मजबूत व्यवस्था नहीं होती।

समस्या यहीं से शुरू होती है। कई जगहों पर जकात का बड़ा हिस्सा सिर्फ मदरसों के खर्च में चला जाता है जबकि समाज के दूसरे जरूरी क्षेत्रों जैसे इलाज, स्किल ट्रेनिंग, रोजगार या महिलाओं की मदद पर कम ध्यान दिया जाता है। दान देने वाले को अक्सर यह पता ही नहीं चलता कि उसका पैसा किस जरूरतमंद तक पहुंचा। कुछ धार्मिक विद्वान भी लोगों को आगाह कर रहे हैं कि जकात देते समय जांच पड़ताल जरूर करें क्योंकि कुछ संगठन पारदर्शिता नहीं रखते। हाल के समय में जम्मू कश्मीर में प्रशासन ने रमजान के दौरान जकात और सदका संग्रह पर नियम सख्त किए और पंजीकरण तथा पहचान पत्र को जरूरी बनाया। सरकार का कहना था कि इससे फर्जीवाड़ा रुकेगा और पैसा सही जगह पहुंचेगा।

हालांकि कुछ धार्मिक नेताओं ने इसे धार्मिक मामलों में दखल बताया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता के लिए किसी न किसी स्तर पर नियम जरूरी हैं। सबसे बड़ी चुनौती हिसाब किताब की कमी है। अगर कोई केंद्रीय डेटा या डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम हो तो दानदाता को यह भरोसा रहेगा कि उसकी दी हुई जकात हकदार लोगों तक पहुंच रही है। आज के दौर में डिजिटल पेमेंट, बैंक ट्रांसफर और ऑनलाइन रसीद से हर लेन देन का रिकॉर्ड रखा जा सकता है। दुनिया के कुछ मुस्लिम देशों में ब्लॉकचेन जैसी तकनीक पर भी काम हो रहा है ताकि फंड का ट्रैक साफ दिखाई दे।

समाज में अब यह चर्चा बढ़ रही है कि जकात सिर्फ एक रस्म न बन जाए बल्कि गरीबी दूर करने का मजबूत जरिया बने। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि एक सामूहिक प्लेटफॉर्म बने जहां अलग अलग संगठन जुड़ें और साल में एक बार सार्वजनिक रिपोर्ट पेश करें। सरकार वक्फ बोर्ड या रजिस्टर्ड ट्रस्ट के जरिए निगरानी मजबूत कर सकती है। साथ ही दान देने वालों को भी जागरूक होना होगा कि वे सिर्फ भरोसे पर नहीं बल्कि प्रमाण और रिपोर्ट देखकर जकात दें।

जकात का असली मकसद जरूरतमंद को सहारा देना है। अगर यह पैसा सही हाथों में पहुंचे तो शिक्षा केंद्र खुल सकते हैं, इलाज के लिए फंड बन सकते हैं और गरीब परिवार अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं। लेकिन अगर पारदर्शिता न हो तो समाज में शक और गलतफहमियां पैदा होती हैं। रमजान हमें सिर्फ रोजा रखने का नहीं बल्कि सामाजिक इंसाफ का भी पैगाम देता है। वक्त की जरूरत है कि जकात के सिस्टम को ईमानदारी, जवाबदेही और आधुनिक तकनीक से मजबूत बनाया जाए ताकि हर दानदाता को यकीन हो कि उसका दिया हुआ हिस्सा सच में किसी जरूरतमंद की जिंदगी बदल रहा है।

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