(रईस खान)
ट्रंप की होर्मुज अपील नाकाम रही क्योंकि सहयोगी देश युद्ध में फंसना नहीं चाहते और ट्रंप टीम ने ईरान की ताकत को कम आंका। यह फैसला वैश्विक तेल सुरक्षा के लिए जरूरी था, लेकिन तैयारी की कमी ने नुकसान पहुंचाया। अब ट्रंप को अकेले या छोटे गठबंधन के साथ आगे बढ़ना पड़ेगा। दुनिया देख रही है, क्या अमेरिका होर्मुज खोल पाएगा या तेल संकट और बढ़ेगा?
ट्रंप प्रशासन ने सबसे बड़ी गलती यह की कि उन्होंने ईरान के जवाबी हमले को कम आंका। उन्होंने सोचा था, “ईरान पर हमला करेंगे तो वह जल्दी घुटने टेक देगा या होर्मुज बंद नहीं करेगा, क्योंकि इससे ईरान को खुद नुकसान होगा।” लेकिन ईरान ने साबित कर दिया कि वह लड़ सकता है। ईरानी क्रांतिकारी गार्ड ने सस्ते ड्रोन, समुद्री ड्रोन और माइन्स से जहाजों पर हमले शुरू कर दिए। अमेरिकी सेना को लगातार हवाई गश्त करनी पड़ रही है, लेकिन तैयारी नहीं थी।
जिन देशों से मदद मांगी, उनका जवाब साफ इनकार या चुप्पी रहा। ब्रिटेन और फ्रांस ने कहा कि अभी कोई फैसला नहीं, जर्मनी ने सीधे मना कर दिया। जापान ने कानूनी अड़चन बताई, दक्षिण कोरिया ने समीक्षा की बात कही और ऑस्ट्रेलिया ने साफ इनकार कर दिया। चीन ने शांति की बात की लेकिन युद्धपोत भेजने से कतराया। खाड़ी के देशों ने भी अपना हवाई क्षेत्र और बंदरगाह इस्तेमाल करने से मना कर दिया। ट्रंप ने नाटो को चेतावनी दी कि अगर मदद नहीं हुई तो नाटो का भविष्य बहुत बुरा होगा, लेकिन फिर भी कोई देश तैयार नहीं हुआ। ईरान ने मजाक उड़ाया कि अगर हमारी नौसेना खत्म हो गई तो ट्रंप खुद जहाज भेजें।
दूरगामी परिणाम गहरे और खतरनाक हो सकते हैं। सबसे पहले वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ेगी, स्टॉक मार्केट गिरेगा और रूस जैसे देश फायदा उठा रहे हैं। दूसरा, नाटो और अमेरिका के पुराने रिश्तों पर दरार पड़ेगी। ट्रंप की “हम याद रखेंगे” वाली धमकी ने सहयोगियों को नाराज कर दिया है। तीसरा, युद्ध लंबा खिंच सकता है। ईरान मजबूत हो रहा है और प्रचार में जीत रहा है। चौथा, खाड़ी इलाके में अस्थिरता बढ़ेगी, जिसका असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति पर पड़ेगा। सबसे बड़ा खतरा यह कि अमेरिका की वैश्विक ताकत की छवि कमजोर हो रही है। अगर होर्मुज नहीं खुला तो ट्रंप की साख पर सवाल भी उठेंगे।
ट्रंप अभी भी आशावादी हैं और कह रहे हैं कि युद्ध कुछ हफ्तों में खत्म हो जाएगा। संभावना है कि अमेरिका अकेले नौसेना से जहाजों की सुरक्षा शुरू करे, खर्ग द्वीप पर और हमले करे जहां से ईरान का 90 प्रतिशत तेल निर्यात होता है, या ईरान से बेहतर शर्तों पर डील की कोशिश करें । कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अमेरिकी नेवी अब खुद एस्कॉर्ट शुरू कर सकती है। लेकिन बिना सहयोग के यह जोखिम भरा होगा।
होर्मुज की अपील ट्रंप के लिए एक सबक बन गई। यह दिखाती है कि अकेले ताकत से दुनिया की समस्याएं नहीं सुलझतीं। सच्ची कूटनीति और बहुपक्षीय सहयोग बहुत जरूरी है।

