(रईस खान)
रमज़ान मुबारक की सत्ताईसवीं रात को पूरी दुनिया के मुसलमान बेहद अकीदत और एहतराम के साथ लैलतुल क़द्र यानी शब-ए-क़द्र मनाते हैं। इस्लामी के मुताबिक इसी मुबारक रात में पवित्र किताब कुरआन का नुज़ूल शुरू हुआ था और कुरआन में इस रात को “हज़ार महीनों से बेहतर” बताया गया है।
यही वजह है कि हिंदुस्तान, पाकिस्तान और पूरे बर्रेसग़ीर में यह रात इबादत, दुआ और कुरआन की तिलावत के साथ गुज़ारी जाती है। मस्जिदों में इशा की नमाज़ से ही लोगों की भीड़ बढ़ने लगती है और फज्र तक नमाज़, तिलावत और दुआओं का सिलसिला चलता रहता है।
बर्रेसग़ीर की मस्जिदों में रमज़ान के पूरे महीने तरावीह की नमाज़ का खास इंतज़ाम किया जाता है। आम तौर पर रमज़ान की शुरुआत से ही हाफ़िज़-ए-कुरआन तरावीह में हर रोज़ कुरआन का एक हिस्सा सुनाते हैं और अधिकतर मस्जिदों में सत्ताईसवीं रात को कुरआन मुकम्मल होने की रस्म अदा की जाती है। इस मौके पर मस्जिदों में एक अलग ही रूहानी माहौल बन जाता है। नमाज़ के बाद खास दुआ कराई जाती है और लोग बड़ी तादाद में उसमें शामिल होकर अपने गुनाहों की माफी और दुनिया में अमन के लिए दुआ करते हैं।
कई जगहों पर कुरआन मुकम्मल होने के बाद मस्जिद में एक छोटी सी महफिल भी आयोजित की जाती है। इसमें मस्जिद के इमाम, हाफ़िज़ और तरावीह पढ़ाने वाले क़ारी की खिदमत के लिए लोगों की तरफ से तोहफे और नकद ईनाम पेश किया जाता है।
अक्सर नमाज़ियों की तरफ से चंदा इकट्ठा किया जाता है और उसे सम्मानपूर्वक इमाम साहब और हाफ़िज़-ए-कुरआन को दिया जाता है। यह परंपरा बरसों से चली आ रही है और इसे कुरआन की खिदमत करने वालों के सम्मान के रूप में देखा जाता है।
कई मस्जिदों में इस मौके पर नात, सलाम और मिलाद शरीफ की महफिल भी सजती है, जिसमें पैगंबर-ए-इस्लाम मुहम्मद स० की शान में नात और सलाम पढ़े जाते हैं। इसके बाद सामूहिक दुआ होती है, जिसमें देश की खुशहाली, समाज में अमन और इंसानियत की भलाई के लिए दुआ मांगी जाती है। कई जगहों पर नमाज़ियों के लिए तबर्रुक या हल्का सा खाने-पीने का इंतज़ाम भी किया जाता है, जिससे रात भर इबादत करने वाले लोगों को सहूलियत मिल सके।
पाकिस्तान में भी इस रात को लेकर बेहद खास इंतज़ाम किए जाते हैं। दावत ए इस्लामी की ओर से कराची और दूसरे शहरों में बड़े इज्तिमा आयोजित होते हैं, जिनमें हजारों लोग शामिल होते हैं और इन कार्यक्रमों को मदनी चैनल के जरिए दुनिया भर में लाइव दिखाया जाता है। इन कार्यक्रमों में दीन पर बयान, नातख्वानी और सामूहिक दुआ का सिलसिला पूरी रात चलता रहता है। इसी तरह मुहम्मद ताहिरुल क़ादरी से जुड़े मरकज़ों में भी सत्ताईसवीं रात को खास धार्मिक कार्यक्रम, बयान और नात की महफिलें आयोजित की जाती हैं, जिन्हें टीवी और इंटरनेट के जरिए बड़ी संख्या में लोग देखते हैं।
भारत में भी कई शहरों की मस्जिदों में सत्ताईसवीं रात को खास रौनक दिखाई देती है। दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद, लखनऊ की बड़ी मस्जिदों, हैदराबाद और मुम्बई की मस्जिदों में लोग रात भर इबादत करते हैं। कई जगहों पर कुरआन मुकम्मल होने के बाद खास दुआ और बयान होते हैं और नमाज़ियों की भीड़ देर रात तक बनी रहती है।
दरअसल शब-ए-क़द्र की रात सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि मुसलमानों के लिए रूहानी ताज़गी और आत्ममंथन का मौका भी होती है। इस रात लाखों लोग मस्जिदों में इकट्ठा होकर अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं, अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने की दुआ करते हैं और पूरी दुनिया में अमन और इंसानियत के लिए दुआ करते हैं।
इसी वजह से हर साल रमज़ान की सत्ताईसवीं रात को बर्रेसग़ीर की मस्जिदों में एक खास रौनक और रूहानी माहौल देखने को मिलता है। कुरआन की तिलावत, नात, सलाम, मिलाद और सामूहिक दुआओं से गूंजती यह रात मुसलमानों के लिए साल की सबसे बरकत और रहमत वाली रात मानी जाती है।

