मियाँ चूर बाबा की मज़ार है मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे की मिसाल

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हरदोई जिले का मटियामऊ शरीफ एक ऐसा मुकाम है जहां रूहानियत और आपसी भाईचारे की खूबसूरत झलक देखने को मिलती है।मल्लावां के पास स्थित यह जगह सदियों से लोगों की आस्था का केंद्र रही है। यहां हज़रत अब्दुल रसूल शाह, जिन्हें लोग मियाँ चूर बाबा के नाम से जानते हैं, की दरगाह मौजूद है। हर साल यहां उनका उर्स बड़े अदब और धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें दूर-दूर से हजारों लोग शामिल होते हैं।

मटियामऊ शरीफ माधोगंज कन्नौज रोड पर स्थित है और आसपास के इलाकों में काफी मशहूर है। मियाँ चूर बाबा को एक बड़े सूफी संत के रूप में माना जाता है। लोग उन्हें अलग-अलग नामों से भी याद करते हैं और उनकी शख्सियत को बहुत ऊंचा दर्जा देते हैं। उनकी दरगाह पर आने वाले लोग उन्हें अपना रूहानी सहारा मानते हैं।

हर साल उनका उर्स खास तौर पर अप्रैल के आखिरी दिनों या मई की शुरुआत में मनाया जाता है। साल 2026 में यह 30 अप्रैल, 1 और 2 मई को होगा। इस दौरान दरगाह पर बहुत रौनक रहती है। क़व्वाली, मुशायरे और जलसे होते हैं, जिनमें मशहूर फनकार अपनी प्रस्तुति देते हैं। लाखों लोग यहां पहुंचते हैं, जिनमें हर धर्म के लोग शामिल होते हैं। चादर चढ़ाना, फातिहा पढ़ना और दुआ करना यहां की खास रस्में हैं।

सूफी परंपराओं और स्थानीय लोक कथाओं के अनुसार वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के घराने से ताल्लुक रखते हैं। कई जायरीन उन्हें सिलसिलों की कामिल खिलाफत प्राप्त बताते हैं।

उनका संबंध सूफी सिलसिले में उच्च पद वाले औलिया-ए-किराम से जोड़ा जाता है। कुछ परंपराओं में उन्हें मखदूम जहानिया जैसे अन्य सूफी संतों से आध्यात्मिक संबंध बताया जाता है। वे बादशाह-ए-औलिया, कुतबुल अकताब, सुल्तानुल आरिफीन और मखदूमुल अश्फिया जैसे खिताबों से नवाजे गए। इन उपाधियों से स्पष्ट होता है कि वे अपने समय के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र थे और राजा-महाराजाओं तथा सुल्तानों के दरबारों में भी सम्मानित थे। लोक मान्यता है कि उन्होंने कई शासकों के सिंहासन को अपनी दुआओं और आशीर्वाद से ऊंचा उठाया।

सूफी संतों की परंपरा में मियाँ चूर बाबा इश्क-ए-इलाही , ज़िक्र, फिक्र और खिदमत-ए-खल्क के प्रतीक थे। वे तसव्वुफ की गहराई में डूबे हुए संत थे, जो बाहरी रस्मों से ज्यादा आंतरिक शुद्धता और इंसानियत पर जोर देते थे।

मटियामऊ में उर्स के दौरान एक बड़ा मेला भी लगता है। यहां सिर्फ इबादत ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। लोग परिवार के साथ आते हैं और एक दूसरे के साथ खुशी बांटते हैं। आज के दौर में कुछ कार्यक्रम इंटरनेट के जरिए भी लोगों तक पहुंचते हैं, जिससे दूर बैठे लोग भी इस माहौल से जुड़ पाते हैं।

मियाँ चूर बाबा को रूहानियत का प्रतीक माना जाता है। लोग मानते हैं कि उनकी दरगाह पर की गई सच्ची दुआ कबूल होती है और दिल को सुकून मिलता है। यहां आने वाले कई लोग बताते हैं कि उन्हें मानसिक शांति और राहत महसूस होती है। उनकी शिक्षाएं लोगों को अच्छे काम करने, अल्लाह को याद करने और जरूरतमंदों की मदद करने की सीख देती हैं।

उनकी सबसे बड़ी पहचान इंसानियत है। उनकी दरगाह पर कोई भेदभाव नहीं होता। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही बराबरी से यहां आते हैं और अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। उर्स के दौरान लंगर बांटा जाता है, जिसमें हर किसी को बिना किसी फर्क के खाना दिया जाता है। यह दिखाता है कि सच्चा धर्म इंसानियत है।

मटियामऊ की दरगाह गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीती जागती मिसाल है। यहां अलग-अलग धर्मों के लोग मिलकर एक दूसरे की इज्जत करते हैं और साथ रहते हैं। यह जगह हमें सिखाती है कि प्यार और भाईचारा ही समाज को मजबूत बनाता है।

आज के समय में जब समाज में अलगाव की बातें होती हैं, ऐसे में मटियामऊ जैसी जगहें हमें जोड़ने का काम करती हैं। जो भी यहां आता है, वह सुकून और उम्मीद लेकर लौटता है। मियाँ चूर बाबा की दरगाह सिर्फ एक धार्मिक जगह नहीं, बल्कि इंसानियत और मोहब्बत का पैगाम देने वाली एक खास पहचान है।

पेशकश – सलमान चिश्ती

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