(रईस खान)
जब नमाज़ की बात होती है, तो बहुत से लोग इसे सिर्फ़ मुसलमानों की इबादत समझते हैं। लेकिन अगर इसकी गहराई में जाएँ, तो नमाज़ सिर्फ़ मज़हबी रस्म नहीं, बल्कि इंसान को बेहतर बनाने का एक तरीका भी है। इसकी फ़िलॉसफ़ी ऐसी है जिसे हर धर्म और हर सोच का इंसान समझ सकता है।
ज़रा अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर ग़ौर कीजिए।
अगर कोई हमारी मदद करता है, हमें कोई तोहफ़ा देता है, मुश्किल वक़्त में हमारा साथ देता है या हमारे लिए कोई अच्छा काम करता है, तो हम उसे “थैंक यू” कहते हैं। अगर हमसे कोई ग़लती हो जाए, तो हम “सॉरी” कहते हैं। जो इंसान शुक्रिया अदा करना और अपनी ग़लती मानना जानता है, उसे समाज भी अच्छा इंसान मानता है।
अब सवाल यह है कि अगर कोई यह यक़ीन रखता है कि उसे ज़िंदगी, सांस, सेहत, औलाद, रोज़ी और हर तरह की नेमतें अल्लाह ने दी हैं, तो क्या अपने पैदा करने वाले का शुक्र अदा करना भी ज़रूरी नहीं होना चाहिए?
यहीं से नमाज़ की शुरुआत होती है।
नमाज़ में मुसलमान अपने रब के सामने खड़ा होकर उसका शुक्र अदा करता है। अपनी कमज़ोरियाँ और ग़लतियाँ क़ुबूल करता है, उनसे माफ़ी माँगता है और यह दुआ करता है कि उसे सीधा रास्ता मिले और वह एक अच्छा इंसान बन सके।
अगर आप मज़हब से हटकर भी देखें, तो नमाज़ हमें तीन बहुत बड़ी बातें सिखाती है।
पहली बात, शुक्रगुज़ारी
आज मनोविज्ञान भी कहता है कि जो लोग अपनी ज़िंदगी की अच्छी चीज़ों के लिए शुक्रगुज़ार रहते हैं, वे ज़्यादा पुरसुकून और ख़ुश रहते हैं। शिकायत करने से ज़्यादा शुक्रिया अदा करना इंसान को अंदर से मज़बूत बनाता है।
दूसरी बात, अपनी ग़लती मानना
दुनिया का कोई इंसान ग़लती से पाक नहीं है। लेकिन जो अपनी ग़लती मान ले, उसे सुधारने की कोशिश करे और माफ़ी माँगने में शर्म महसूस न करे, वही आगे बढ़ता है। नमाज़ इंसान को यही आदत सिखाती है।
तीसरी बात, रोज़ अपने आपको बेहतर बनाना
नमाज़ दिन में पाँच बार इंसान को रुककर यह सोचने का मौक़ा देती है कि आज उसने क्या अच्छा किया, कहाँ ग़लती हुई और कल वह अपने आपको कैसे बेहतर बना सकता है। यह अपने दिल और अपने किरदार का रोज़ का हिसाब है।
यही वजह है कि नमाज़ सिर्फ़ कुछ अल्फ़ाज़ पढ़ने या कुछ हरकतें करने का नाम नहीं है। यह इंसान को तकब्बुर से बचाती है और उसे याद दिलाती है कि चाहे वह कितना भी कामयाब क्यों न हो जाए, उसे हमेशा शुक्रगुज़ार और फ़रमाबरदार रहना चाहिए।
अगर एक आसान मिसाल दें, तो नमाज़ अपने रब से रोज़ की मुलाक़ात है। जैसे एक अच्छा बेटा अपने माँ-बाप का हाल पूछता है, उनका शुक्रिया अदा करता है और ग़लती होने पर माफ़ी माँगता है, वैसे ही एक मोमिन अपने पैदा करने वाले के सामने खड़ा होकर कहता है,
“ऐ अल्लाह! जो कुछ तूने दिया, उसका शुक्रिया। जो ग़लतियाँ मुझसे हुईं, उन्हें माफ़ फ़रमा। और मुझे ऐसा बना कि मैं तेरे बंदों के लिए भी फ़ायदेमंद इंसान बन सकूँ।”
इसलिए नमाज़ को सिर्फ़ मुसलमानों की इबादत कहकर छोड़ देना उसकी पूरी तस्वीर नहीं है। उसकी असली रूह यह है कि इंसान अपने अंदर शुक्रगुज़ारी पैदा करे, अपनी ग़लतियों को पहचाने, उन्हें सुधारे और हर दिन पहले से बेहतर इंसान बनने की कोशिश करे।
यही पैग़ाम किसी एक मज़हब तक सीमित नहीं है। हर समाज, हर तहज़ीब और हर दौर में अच्छे इंसान की पहचान यही रही है कि वह एहसान को माने, ग़लती पर माफ़ी माँगे और अपने किरदार को बेहतर बनाता रहे। नमाज़ इसी सोच को रोज़ ज़िंदगी में उतारने का नाम है।

