ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने संसद से पारित उस संशोधन विधेयक पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें वंदे मातरम् का अपमान दंडनीय अपराध बनाने का प्रावधान किया गया है। बोर्ड का कहना है कि किसी गीत को कानून के ज़रिए सभी नागरिकों पर अनिवार्य करना संविधान की भावना, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक आज़ादी के खिलाफ़ है।
बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सैयद क़ासिम रसूल इलियास ने कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और अपनी अंतरात्मा के अनुसार जीवन जीने का अधिकार देता है। ऐसे में किसी व्यक्ति को उसके धार्मिक विश्वास के खिलाफ़ किसी गीत या नारे में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि संविधान सभा ने भी विचार-विमर्श के बाद वंदे मातरम् के केवल शुरुआती दो बंदों को ही राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया था। बाकी हिस्सों में मौजूद धार्मिक भावों को देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुरूप नहीं माना गया था।
डॉ. इलियास ने कहा कि वंदे मातरम् के कुछ अंशों में भारत माता को देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस्लाम में इबादत केवल एक अल्लाह की की जाती है, इसलिए किसी मुसलमान को अपने धार्मिक विश्वास के विरुद्ध ऐसे गीत में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है कि यदि किसी व्यक्ति का धार्मिक विश्वास उसे किसी राष्ट्रीय गीत या गान में भाग लेने से रोकता है, तो केवल इस आधार पर उसे दंडित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा था कि सम्मानपूर्वक चुप रहना भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है।
बोर्ड ने कहा कि वतन से मोहब्बत और वतन की पूजा दो अलग बातें हैं। मुसलमान अपने देश से प्यार करते हैं और उसे अपना राष्ट्रीय और नागरिक फ़र्ज़ मानते हैं, लेकिन अपने धार्मिक विश्वास के कारण किसी को इबादत या पूजा का दर्जा नहीं दे सकते।
अपने बयान में बोर्ड ने सरकार से अपील की कि वह ऐसे विवादित मुद्दों के बजाय बेरोज़गारी, महंगाई, ग़रीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक असमानता जैसी देश की असली समस्याओं पर ध्यान दे। बोर्ड का कहना है
कि देश की एकता और लोकतंत्र तभी मज़बूत होगा, जब हर नागरिक की धार्मिक आज़ादी, संवैधानिक अधिकार और समान सम्मान की रक्षा की जाएगी।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

