बैंकिंग और फाइनेंस सिस्टम, मुस्लिम कारोबार की चुनौतियाँ और संभावनाएँ

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(रईस खान)

कानपुर के मीरपुर कैंट में रविवार को अब्दुल हमीद इदरीसी साहब की क़यादत में “बैंकिंग और फाइनेंस सिस्टम, मुस्लिम कारोबार की चुनौतियाँ और संभावनाएँ” विषय पर एक अहम परिचर्चा आयोजित की गई। यह कार्यक्रम मुस्लिम समुदाय में बैंकिंग और वित्तीय जागरूकता बढ़ाने, शरिया सिद्धांतों के अनुरूप वित्तीय विकल्पों की समझ विकसित करने और कारोबारी विकास की राह तलाशने के उद्देश्य से किया गया था।

चर्चा में बैंकिंग क्षेत्र, शिक्षा जगत और कारोबारी समुदाय से जुड़े कई अनुभवी लोगों ने भाग लिया। परिचर्चा के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि मुस्लिम समाज में बैंकिंग प्रणाली को लेकर जागरूकता का अभाव आज भी एक बड़ी समस्या है। बहुत से लोग अभी भी बैंकिंग व्यवस्था से दूर हैं, जिसके कारण वे सरकारी योजनाओं, ऋण सुविधाओं और आधुनिक वित्तीय अवसरों का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यदि मुस्लिम समुदाय को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है, तो सबसे पहले उन्हें बैंकिंग और फाइनेंस के क्षेत्र में अपनी भागीदारी बढ़ानी होगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे यूनाइटेड इदरीसी फ्रंट के नायब सदर अब्दुल हमीद इदरीसी साहब, जो पीएनबी बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं, ने कहा कि “मुस्लिम समाज को आर्थिक रूप से मज़बूत करने के लिए बैंकिंग से जुड़ना अत्यंत आवश्यक है। जब तक हमारी पूंजी बैंकिंग सिस्टम में शामिल नहीं होगी, तब तक हम विकास की मुख्यधारा से दूर रहेंगे।” उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अब केवल चर्चा नहीं, बल्कि ठोस कार्यवाही का समय है।

पीएनबी बैंक से रिटायर्ड बैंक मैनेजर आफ़ताब साहब ने कहा कि “ब्याज (रिबा) के मसले पर धार्मिक बहस के साथ-साथ व्यावहारिक समाधान भी तलाशने होंगे। इस्लामी फाइनेंसिंग के सिद्धांतों, जैसे मुराबाहा, इजारा और मुदारबा, को भारतीय संदर्भ में समझकर वैकल्पिक और नैतिक वित्तीय मॉडल विकसित किए जा सकते हैं।

पीएनबी बैंक में कार्यरत बैंक मैनेजर लियाक़त साहब ने कहा कि “आज बैंकिंग पूरी तरह पारदर्शी और तकनीकी हो चुकी है। मुस्लिम कारोबारी यदि डिजिटल भुगतान, चालू खाता, और टैक्स अनुपालन को अपनाएं तो वे बहुत तेज़ी से आर्थिक रूप से आगे बढ़ सकते हैं।”

इस परिचर्चा में  शिक्षाविद शाहिद कामरान ने परेट ग्राउंड और कुरैश समुदाय के उदाहरण देते हुए कहा कि “पहले जब परचियाँ पाँच-दस रुपये में काटी जाती थीं, तब लोग उसे लेने से कतराने लगे। यह मानसिक दूरी ही सबसे बड़ी बाधा बन गई है। मुस्लिम समाज जब तक दस्तावेज़ी व्यवस्था और औपचारिक वित्तीय प्रक्रियाओं से खुद को जोड़ने की पहल नहीं करेगा, तब तक वह बैंकिंग सेक्टर में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज नहीं करा सकेगा।” उन्होंने कहा कि बैंकिंग से दूर रहना केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि यह विकास की मुख्यधारा से कटने के समान है।

हलीम कॉलेज के कॉमर्स विभाग के सेवानिवृत्त व्याख्याता अज़ीज़ साहब ने अपने विचार रखते हुए कहा कि “आर्थिक शिक्षा और वित्तीय साक्षरता को जमीनी स्तर पर ले जाना समय की ज़रूरत है। जब युवाओं को बैंकिंग और फाइनेंस की बुनियादी समझ मिलेगी, तभी वे आत्मनिर्भर बन सकेंगे।

कार्यक्रम के अंत में क़ौमी फ़रमान के संपादक ने परिचर्चा में रखे गए सुझावों का संज्ञान लेते हुए कहा कि “अब केवल बातें नहीं, बल्कि अमल की ज़रूरत है। हमें एक सामूहिक एक्शन प्लान तैयार करना होगा।” उन्होंने जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि वे इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए एक ठोस कार्ययोजना तैयार करेंगे, जिसमें फाइनेंस अवेयरनेस कैंप, बैंकिंग काउंसलिंग, एमएसएमई और डिजिटल फाइनेंस प्रशिक्षण जैसे कार्यक्रम शामिल होंगे।

बैठक में मुशीर आलम, तारिक हाशमी, साद खान और आसिफ खान ने भी अपने विचार व्यक्त किए।परिचर्चा का समापन इस उम्मीद के साथ हुआ कि कानपुर से शुरू हुआ यह प्रयास आगे चलकर एक व्यापक सामाजिक आर्थिक अभियान बनेगा। उपस्थित प्रतिभागियों ने यह संकल्प लिया कि वे अपने स्तर पर समाज में आर्थिक साक्षरता, बैंकिंग से जुड़ाव और कारोबारी विकास के लिए सक्रिय भूमिका निभाएंगे।

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