(रईस खान)
बिहार की सियासत के मशहूर ‘पलटूराम’ नीतीश कुमार को लोग अक्सर उम्र के आड़ में देखते हैं। कहते हैं, बुड्ढा हो गया है, सठिया गया है, यही वजह है कि ऊटपटांग हरकतें कर बैठता है। लेकिन ये महज एक भ्रम है, हकीकत ये है कि इस उम्र में वो और भी शातिर हो चले हैं। जो कुछ भी कर रहे हैं, वो बखूबी जानते हुए, जानबूझकर करते हैं। हर कदम सियासी फायदे का हिसाब लगाकर, ताकत के मोर्चे पर कायम रहने का सुनियोजित दांव। उम्र को दोष देकर खुद को बचाने का तीर भी चलता रहता है, ताकि जनता का गुस्सा उनके बजाय वक्त पर उतरे।
हाल के दिनों में जो तमाशा बिखेरा है, वो कोई अनजाने में नहीं। एक तरफ, मोदी जी के सामने बार-बार पैर पड़ना, वो भी सार्वजनिक मंच पर, जैसे कोई भक्त हो गया हो। ये नाटक हिंदू वोटरों को लुभाने का? या फिर भाजपा से एक कदम आगे निकलने का? नीतीश को मालूम है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इस दौर में, हिंदू नजरों में ‘मोदी से भी ज्यादा हिंदूवादी’ दिखना फायदेमंद है। उधर, मुस्लिम आयोजनों में टोपी पहनने से इनकार, वो भी सम्मान के नाम पर। कहते हैं, “मैं तो हिंदू हूं, ये मेरे लिए नहीं।” ये ड्रामा? मुस्लिमों को भोला भाला दिखाकर, खुद को उनका रहनुमा साबित करने का। लेकिन असलियत में, ये सब हिंदू-मुस्लिम की खाई को और गहरा करने का हथकंडा है।
और वो वाकया तो हद पार कर गया, जब एक मुस्लिम महिला आयुष डॉक्टर का बुर्का खींच दिया। सार्वजनिक मंच पर, कैमरों के सामने! ये कोई गलती नहीं थी, ये सुनियोजित था, हिंदुत्व के नाम पर सांप्रदायिक उन्माद भड़काने का। नीतीश जानते हैं कि ऐसी हरकतें भाजपा को तो फायदा पहुंचाती ही हैं, लेकिन खुद को उनके कंधे पर सवार कर, बिहार की सत्ता में बने रहने का रास्ता साफ करती हैं। वो मुस्लिमों को दुहाई देते रहते हैं, “मैं आपका हितैषी हूं, आपका रहनुमा”, लेकिन पीठ पीछे, ऐसे कदम उठाते हैं जो उनकी एकता को चूर-चूर कर दें। ये शातिराना चालाकी है, जो उम्र के बहाने छिपाई जाती है। लोग कहेंगे, “बुजुर्ग हैं, गलती हो गई।” लेकिन सच्चाई ये है कि नीतीश ने कभी गलती नहीं की; हर कदम सोचा समझा, ताकत हासिल करने का।
नीतीश ‘पलटूराम’ यूं ही नहीं बने। लालू से अलगाव, फिर भाजपा से गठबंधन, आरजेडी के साथ चले जाना, और अब फिर एनडीए की गोद में, ये सब सत्ता की भूख का नतीजा है। उन्हें पता है कि बिहार जैसे राज्य में, जहां जाति और धर्म की सियासत हावी है, ताकत बरकरार रखने के लिए ध्रुवीकरण ही सबसे बड़ा हथियार है। वो मुस्लिमों को लुभाने के लिए भोली-भाली बातें करते हैं, हिंदुओं को सांप्रदायिक मुद्दों से उकसाते हैं। लेकिन अंत में, फायदा सिर्फ उनका, कुर्सी पर काबिज रहने का। उम्र का धोखा न खाइए; ये सब निजी तौर पर बहुत सोच-समझकर किया जाता है।
सवाल ये है, बिहार की जनता कब तक इस शातिर खेल का शिकार बनेगी? नीतीश की ये हरकतें न सिर्फ सांप्रदायिक सद्भाव को चोट पहुंचाती हैं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती हैं। वक्त है कि हम उम्र के परदे को हटाकर, इनकी सियासी चालाकी को पहचानें। वरना, ये ‘रहनुमा’ बनकर सबको लूटते रहेंगे। बिहार को चाहिए एक ऐसी सियासत जो एकजुट करे, न कि बांटे। नीतीश साहब, आपकी शातिरी अब बेनकाब हो चुकी है, अब बहाने बंद कीजिए, और असली हितों की बात कीजिए।

