(रईस खान)
आज का इंसान सवाल करता है। वह सिर्फ़ मान लेना नहीं चाहता, वह समझना चाहता है। ख़ुदा, धर्म और आस्था जैसे मौज़ू अब मस्जिद या मंदिर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि कॉलेजों, सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर खुलकर बहस का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे दौर में धर्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह सवालों से भागे या उनका सामना करे। इसी संदर्भ में मुफ़्ती शमाएल नदवी का नाम उभरकर सामने आता है, एक ऐसे इस्लामी विद्वान के रूप में जो ईमान की बात तर्क और संवाद के साथ करते हैं, न कि डर या दबाव के साथ।
मुफ़्ती शमाएल नदवी इस्लाम को केवल रस्मों और इबादतों का मज़हब नहीं बताते, बल्कि एक सोचने-समझने वाली ज़िंदगी का निज़ाम मानते हैं। उनके मुताबिक़ क़ुरआन इंसान से बार-बार सवाल करता है, क्या तुम सोचते नहीं, क्या तुम अक़्ल से काम नहीं लेते? यही वजह है कि वे ख़ुदा के वजूद की बात भावनाओं से ज़्यादा दलीलों के सहारे रखते हैं।उनका कहना है कि अगर ख़ुदा नहीं है, तो ज़िंदगी सिर्फ़ एक हादसा बनकर रह जाती है, और नैतिकता सिर्फ़ समाज की बनाई हुई सहूलियत। लेकिन अगर ख़ुदा है, तो इंसान की ज़िंदगी मक़सद और ज़िम्मेदारी से जुड़ जाती है।
मुफ़्ती शमाएल नदवी कोलकाता की प्रसिद्ध कोबी बागान मस्जिद के खतीब हैं और देश-विदेश में अपने व्याख्यानों के जरिए पहचाने जाते हैं। उनकी शिक्षा इस्लामी दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थान दारुल उलूम नदवतुल उलमा, लखनऊ से हुई। उन्होंने यहाँ से आलिमियत की पढ़ाई पूरी करने के बाद तफ़सीर और उलूमुल क़ुरआन में पोस्ट-ग्रेजुएशन, तथा तदरीब अलल इफ्ता में काबिलियत हासिल की।
उनकी दिल्ली में जावेद अख्तर के साथ हुई बहस इसी सोच का एक अहम मोड़ थी। यह बहस सिर्फ़ इस बात पर नहीं थी कि ख़ुदा है या नहीं, बल्कि इस पर थी कि इंसान अपनी ज़िंदगी को किस नज़र से देखता है। जावेद अख्तर ने नास्तिक नज़रिए से यह कहा कि ख़ुदा इंसान की कल्पना है, जो डर और बेबसी से पैदा हुई। इसके जवाब में मुफ़्ती शमाएल नदवी ने बहुत सादगी से यह बात रखी कि ख़ुदा कोई खाली जगह भरने वाला ख़याल नहीं, बल्कि कायनात के उस निज़ाम की ताबीर है जो हर जगह नज़र आता है,चाहे वह क़ानून-ए-फ़ितरत हो, इंसानी ज़मीर हो या सही-गलत की समझ।
इस बहस की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि इसमें तल्ख़ी नहीं थी। न कोई चीख़-चिल्लाहट, न एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश। मुफ़्ती नदवी ने यह साबित किया कि इस्लाम सवालों से डरता नहीं। बल्कि वह सवालों को ज़रूरी समझता है, क्योंकि बिना सवाल के यक़ीन भी मज़बूत नहीं होता।
मुफ़्ती शमाएल नदवी ख़ुदा की बात को इस तरह रखते हैं कि वह आम इंसान के अनुभव से जुड़ जाए। वे कहते हैं कि इंसान के अंदर जो सही-गलत की आवाज़ है, जो इंसाफ़ की चाह है, जो मक़सद की तलाश है, वह सब किसी अंधे इत्तिफ़ाक़ का नतीजा नहीं हो सकता। इस्लाम उसी अंदरूनी आवाज़ को ख़ुदा से जोड़ता है। उनके मुताबिक़ बहुत से लोग असल में ख़ुदा से नहीं, बल्कि मज़हब के ग़लत चेहरों से नाराज़ होते हैं।
आज की नई नस्ल, जो सोशल मीडिया पर पली-बढ़ी है, वह सीधे सवाल पूछती है। मुफ़्ती शमाएल नदवी इसी नस्ल से उसकी ज़ुबान में बात करते हैं। वे इस्लाम को पुरानी सदी की चीज़ बनाकर पेश नहीं करते, बल्कि एक ऐसी ज़िंदगी की राह बताते हैं जिसमें अक़्ल, इल्म और ईमान साथ-साथ चलते हैं।
जावेद अख्तर के साथ हुई बहस का नतीजा यह नहीं था कि कोई जीत गया या हार गया। असल नतीजा यह था कि यह साबित हुआ कि भारत में ख़ुदा और इस्लाम पर बात शांति, तहज़ीब और दलील के साथ भी हो सकती है। मुफ़्ती शमाएल नदवी ने यह दिखाया कि असहमति दुश्मनी नहीं होती, और बहस भी अगर ईमानदारी से हो, तो वह इंसान को सोचने पर मजबूर कर देती है।
आज जब दुनिया में या तो मज़हब को खारिज़ किया जा रहा है या उसे सियासत का औज़ार बनाया जा रहा है, ऐसे में मुफ़्ती शमाएल नदवी की आवाज़ यह याद दिलाती है कि इस्लाम न तो अक़्ल का दुश्मन है, न सवालों से घबराने वाला मज़हब। ख़ुदा पर बात करना, अगर समझदारी और सच की तलाश के साथ हो, तो वह भी एक तरह की इबादत ही है।
डिजिटल युग की ज़रूरतों को समझते हुए मुफ़्ती शमाएल नदवी ने “मरकज़ अल-वहीयन” नामक एक ऑनलाइन शैक्षिक संस्थान की स्थापना की। इस मंच के माध्यम से वे दुनिया भर के मुस्लिम युवाओं को क़ुरआन-हदीस की समझ, अक़ीदे के बुनियादी सवालों और आधुनिक वैचारिक चुनौतियों पर संतुलित इस्लामी नजरिया पेश करते हैं।
इसके अलावा, उन्होंने “वहीयन फाउंडेशन” भी बनाया है, जो शिक्षा, सामाजिक सुधार और समाजी हलकों में सक्रिय भूमिका निभा रही है। यह संस्था इस बात का सबूत है कि मुफ़्ती शमाएल नदवी के लिए इल्म केवल भाषण तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का जरिया है।

