(रईस खान)
उत्तर प्रदेश में हलाल सर्टिफिकेशन पर रोक लगाई जाती है और कहा जाता है कि यह भ्रामक है, गैर जरूरी है और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ता है। उसी वक्त केंद्र सरकार उसी हलाल सर्टिफिकेशन को भारत की बड़ी कूटनीतिक और व्यापारिक सफलता बताकर दुनिया के सामने पेश करती है। सवाल यह है कि जो चीज अपने देश में गलत है वही विदेश में सही कैसे हो सकती है।
हलाल क्या है
हलाल कोई धार्मिक प्रचार नहीं बल्कि एक तकनीकी सर्टिफिकेशन है। जैसे आईएसओ या एफएसएसएआई बताता है कि उत्पाद किस प्रक्रिया से बना है वैसे ही हलाल यह बताता है कि मांस और खाद्य उत्पाद तय मानकों के अनुसार तैयार हुए हैं। इसे मानना या न मानना ग्राहक की मर्जी है। सरकार का काम विकल्प देना है रोक लगाना नहीं।
घरेलू राजनीति विदेशी समझदारी
वाणिज्य मंत्री खुद कह रहे हैं कि ओमान द्वारा हलाल सर्टिफिकेशन को मान्यता मिलने से भारतीय निर्यातकों की लागत घटेगी और बाजार में पहुंच आसान होगी। यानी वही सर्टिफिकेशन व्यापार को सरल बनाता है। तो फिर उत्तर प्रदेश में वही व्यापार के लिए खतरा कैसे बन गया। फर्क सिर्फ इतना है कि एक जगह वोट दिखते हैं और दूसरी जगह डॉलर।
व्यापार पर सीधा असर
हलाल पर रोक का सीधा नुकसान छोटे कारोबारियों और निर्यात से जुड़े उद्योगों को होता है। एक राज्य में रोक और दूसरे में छूट से एक राष्ट्र एक बाजार का दावा खोखला लगता है। व्यापारी असमंजस में है कि वह किस नीति पर भरोसा करे।
सरकार से सीधा सवाल
अगर हलाल सर्टिफिकेशन गलत है तो विदेशों में भारत इसे बढ़ावा क्यों दे रहा है। और अगर यह सही और जरूरी है तो अपने ही देश में इसे क्यों रोका जा रहा है। नीति साफ होनी चाहिए एक जैसी होनी चाहिए। देश दोहरे मापदंड से नहीं चलता।
भारत को नारे नहीं स्पष्ट नीति चाहिए। जो नियम विदेशों में भारत का नाम ऊंचा कर रहे हैं वही नियम देश के भीतर भी भरोसा पैदा करें। वरना यह सवाल उठता रहेगा कि देश एक है या नीतियां

