(रईस खान)
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक तेवर हमेशा से ही आग उगलने वाला रहा है। जनवरी 2026 में प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के दौरान आई-पैक, इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी, के कार्यालय और उसके सह-संस्थापक प्रतीक जैन के आवास पर उनका हस्तक्षेप, और उसके बाद अमित शाह पर ‘नास्टी एंड नॉटी होम मिनिस्टर’ कहकर हमला, यह सब उनके पुराने स्टाइल का नया संस्करण है। दीदी ने न केवल ईडी अधिकारियों से दस्तावेज़ और फोन छीन लिए, बल्कि कोलकाता में विरोध मार्च निकालकर केंद्र सरकार को चुनौती दी कि ‘अगर तुम मुझे हिलाओगे, तो मैं पूरे देश में भाजपा की नींव हिला दूंगी’।
यह घटना सिर्फ एक राजनीतिक ड्रामा नहीं, बल्कि ममता के दशकों पुराने ‘स्टैंड’ का प्रमाण है, जहां वह खुद को बंगाल की ‘शेरनी’ के रूप में पेश करती हैं, जो केंद्र की ‘गुंडागर्दी’ के खिलाफ खड़ी है।
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर 1970 के दशक से शुरू होता है, जब वह कांग्रेस की युवा कार्यकर्ता के रूप में कोलकाता की सड़कों पर वामपंथी सरकार के खिलाफ आंदोलन करती थीं। 1984 में, लोकसभा चुनाव में सोमनाथ चटर्जी जैसे दिग्गज को हराकर वह सुर्खियों में आईं। लेकिन उनका असली ‘तेवर’ 1990 के दशक में उभरा, जब उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई। वाम मोर्चा की 34 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों का नेतृत्व किया, जहां किसानों की जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हिंसक विरोध हुआ। 2011 में वामपंथियों को हराकर सत्ता हासिल करने के बाद, ममता ने खुद को ‘मां, माटी, मानुष’ की रक्षक के रूप में स्थापित किया। एक पॉपुलिस्ट नेता, जो बंगाली अस्मिता को केंद्र की ‘दिल्ली वाली साजिश’ से बचाती हैं।
यह तेवर 2014 के बाद और तीखा हुआ, जब भाजपा की केंद्र में सत्ता आई। ममता ने एनआरसी और सीएए के खिलाफ आंदोलन चलाया, बंगाल को ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ का ठिकाना बताने वाले बयानों को बंगाली अपमान करार दिया। 2021 के विधानसभा चुनाव में, उन्होंने पैर में प्लास्टर बंधे होने के बावजूद व्हीलचेयर से प्रचार किया और भाजपा को करारी शिकस्त दी। उनका स्टैंड हमेशा रहा है: केंद्र की एजेंसियां भाजपा की ‘राजनीतिक हथियार’ हैं, जो विपक्षी नेताओं को निशाना बनाती हैं।
हाल के वर्षों में, शाहजहां शेख जैसे टीएमसी नेताओं पर ईडी छापों के दौरान हिंसा जैसे 2024 की संदेशखाली घटना को ममता ने ‘केंद्र की साजिश’ बताया, और अपने कार्यकर्ताओं को ‘जवाबी कार्रवाई’ के लिए उकसाया।
जनवरी 2026 की घटना ममता के तेवर का ताजा उदाहरण है। ईडी ने आई-पैक पर छापा मारा, जो टीएमसी की चुनावी रणनीति बनाता है। आरोप है कि कोयला घोटाले से जुड़े पैसे का इस्तेमाल चुनावों में हुआ।
ममता खुद मौके पर पहुंचीं, दस्तावेज़ और फोन लेकर निकलीं, और ईडी की शिकायत पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने सुनवाई की। अगले दिन, हजारों समर्थकों के साथ मार्च निकालकर उन्होंने अमित शाह पर हमला बोला: ‘एक आंख में दुर्योधन, दूसरी में दुःशासन’, ‘कोयला चोर’, और ‘अगर चाहूं तो शाह को कोलकाता के होटल से बाहर नहीं निकलने दूंगी’। उन्होंने ईडी को ‘भाजपा का चोर दरवाजा’ बताया, जो टीएमसी की कैंडिडेट लिस्ट और रणनीति चुराने आया था।
यह सिर्फ रक्षा नहीं, बल्कि आक्रमण है। ममता ने स्पष्ट कहा: ‘ईडी जो कर सकती है कर ले, लेकिन बंगाल में गुंडई नहीं चलेगी। मैं फाइनल हिसाब कर दूंगी।’ एक्स पर उनके समर्थक इसे ‘शेरनी की दहाड़’ बता रहे हैं, जबकि भाजपा इसे ‘संस्थाओं पर हमला’ करार दे रही है।
ममता का यह स्टैंड राजनीतिक रूप से मजबूत है। वह खुद को संघवाद की योद्धा बनाती हैं, जहां केंद्र ‘बंगाल को लूट रहा है’। यह बंगाली अस्मिता को छूता है, विशेषकर ग्रामीण और मुस्लिम वोटरों को, जो टीएमसी का आधार हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले, यह रणनीति भाजपा को ‘बाहरी’ दिखाती है, और ईडी जैसी एजेंसियों को ‘राजनीतिक हथियार’। इतिहास गवाह है कि ऐसे तेवर ने उन्हें 2011 और 2021 में जीत दिलाई। वह जानती हैं कि ‘घायल शेरनी ज्यादा खतरनाक होती है’, जैसा उन्होंने हाल में कहा।
क्या यह संघीय ढांचे को कमजोर करता है , क्या मुख्यमंत्री जांच एजेंसी से ऊपर है? भाजपा नेता अमित मालवीय जैसे लोग इसे ‘संविधान पर हमला’ बताते हैं। स्पेशल इंटेंसिव रिविजन जैसे मुद्दों पर भी ममता ने चुनाव आयोग को धमकाया, BLOs को डराया, और इसे ‘बंगालियों को रोहिंग्या बताने की साजिश’ कहा। अगर यह जारी रहा, तो राष्ट्रपति शासन की मांग तेज हो सकती है, जैसा कुछ विश्लेषक सुझा रहे हैं। सच्चाई यह है कि ममता का तेवर ‘गुंडों को सभ्यता न दिखाने’ वाला है, जैसा यूजर ने कहा। लेकिन लोकतंत्र में, क्या यह कमजोरी छिपाने का तरीका है?
ममता बनर्जी का स्टैंड धारदार है, लेकिन दोधारी तलवार जैसा। यह उन्हें बंगाल की ‘दीदी’ बनाता है, जो केंद्र से लड़ती है, लेकिन अगर 2026 में भाजपा मजबूत हुई, तो यह बैकफायर कर सकता है। लोकतंत्र में चुनौतियां जरूरी हैं, लेकिन कानून से ऊपर कोई नहीं। दीदी का पुराना तेवर नया मुकाबला मांगता है, क्या अमित शाह ‘होटल से बाहर निकलने’ की चुनौती कबूल करेंगे? बंगाल की सड़कें गुलजार हैं, लेकिन राजनीति की बिजली कब गिरेगी, यह देखना बाकी है।

