उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद ने आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर स्थित 78 साल पुराने मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत अशरफिया मिस्बाहुल उलूम की मान्यता तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दी है। यह कार्रवाई मदरसे के पूर्व सहायक शिक्षक मौलाना शमसुल हुदा खान की अनियमितताओं और विदेशी फंडिंग से जुड़े आरोपों के आधार पर की गई है। शमसुल हुदा, जो 2007 से ब्रिटेन की नागरिकता लेकर लंदन में रह रहे हैं, पर मदरसे से वेतन, पेंशन और अन्य लाभ अनियमित रूप से लेने का आरोप है। इस मामले ने पूरे प्रदेश में मदरसों की फंडिंग और संचालन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मदरसा शिक्षा परिषद की रजिस्ट्रार अंजना सिरोही ने बताया कि जांच में पाया गया कि शमसुल हुदा ने 2007 में ब्रिटिश नागरिकता ग्रहण की और तभी से विदेश में निवास कर रहे हैं। इसके बावजूद मदरसा प्रबंधन ने उन्हें अवैतनिक अवकाश और चिकित्सा अवकाश के नाम पर अनियमित रूप से अनुपस्थिति की स्वीकृति दी। परिणामस्वरूप, वे 2017 तक वेतन, सेवानिवृत्ति लाभ, पेंशन, जीपीएफ और अन्य देयों का भुगतान प्राप्त करते रहे। यह सब मदरसा सेवा नियमावली और वित्तीय अनुशासन का स्पष्ट उल्लंघन है, जिससे राजकोष को करोड़ों रुपये की क्षति पहुंची है। परिषद ने इसे संगठित अपराध की श्रेणी में रखते हुए मान्यता निलंबित की। आजमगढ़ के मदरसे में कार्यरत 85 शिक्षकों और कर्मचारियों के जनवरी 2026 से वेतन और अन्य भुगतान पर रोक लगा दी गई है।
- यह घोटाला नवंबर 2025 में तब सामने आया जब यूपी एटीएस ने शमसुल हुदा पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और विदेशी फंडिंग उल्लंघन का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज की।
- जांच में पता चला कि शमसुल हुदा, जो मूल रूप से संत कबीर नगर के रहने वाले हैं, मदरसा कुल्लियातुल बनातिर रजविया (निस्वा) के पूर्व प्रबंधक भी थे। उन्होंने पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े नेटवर्क से अवैध फंडिंग प्राप्त की, जिसकी राशि करीब 4 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इन फंडों को संत कबीर नगर, आजमगढ़ और आसपास के धार्मिक संस्थानों में वितरित किया गया। एटीएस की रिपोर्ट में शमसुल हुदा की ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, श्रीलंका, खाड़ी देशों और पाकिस्तान की यात्राओं को संदिग्ध पाया गया।
दिसंबर 2025 में प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया। ईडी की जांच में 33 करोड़ रुपये की संपत्तियों और पाकिस्तानी मौलानाओं से लिंक का खुलासा हुआ। शमसुल हुदा पर भारत में इस्लामीकरण की गतिविधियां चलाने और कमीशनखोरी के भी आरोप हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार ने 2014 से 2017 तक आजमगढ़ में तैनात चार जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों को निलंबित कर दिया, जिन्होंने इस फर्जीवाड़े में मिलीभगत की।अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के एक संयुक्त निदेशक को भी सस्पेंड किया गया।
इस मामले से जुड़े दो अन्य मदरसों की भी मान्यता निलंबित की गई है। संत कबीर नगर के खलीलाबाद स्थित कुल्लियातुल बनातिर रजविया और लखनऊ के मड़ियांव स्थित मदरसा हनफिया जियाउल कुरान पर विदेशी फंडिंग और संदिग्ध गतिविधियों के आरोप लगे हैं। कुल्लियातुल बनातिर रजविया के तहत चलने वाली कुल्लियातुल बनातिर रजविया एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी और रजा फाउंडेशन की पंजीकरण भी रद्द कर दिया गया।आजमगढ़ मदरसे के 336 छात्रों को जिले के छह अन्य स्वीकृत मदरसों में स्थानांतरित किया गया है।
1948 में स्थापित अशरफिया मिस्बाहुल उलूम मदरसा प्रदेश के प्रमुख धार्मिक शिक्षा केंद्रों में से एक है। यह मदरसा सरकार से अनुदानित था और यहां सैकड़ों छात्र पढ़ते थे। लेकिन अब इसकी इमारत पर ताले लग चुके हैं, और प्रबंधन को आगे की जांच के लिए नोटिस जारी किया गया है। मदरसे के प्रिंसिपल मोहम्मद अहमद मिस्बाही और प्रबंधक सरफराज अहमद की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है।
शमसुल हुदा फिलहाल लंदन में हैं और उनके खिलाफ गिरफ्तारी या प्रत्यर्पण की कोई पुष्ट रिपोर्ट नहीं आई है। उनके परिवार के सदस्यों और सहयोगियों से पूछताछ की जा रही है। मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। यूपी एटीएस और ईडी की जांच जारी है, जिसमें हवाला, धर्मांतरण और सीमा क्षेत्रों में मदरसों की फंडिंग पर फोकस है। योगी सरकार की मदरसा जांच मुहिम के तहत यह कार्रवाई मदरसों की पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
यह मामला मदरसा शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को तेज कर सकता है। आगे की जांच से और खुलासे होने की संभावना है।
~क़ौमी फरमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

