क्या आपने कभी सुना है वो मशहूर किस्सा, जहां चांद पर कदम रखने वाले पहले इंसान, नील आर्मस्ट्रांग ने वहां अजान की आवाज सुनी और फिर इस्लाम कबूल कर लिया? जी हां, ये वो पुरानी लेकिन जिद्दी अफवाह है जो मुसलमान भाइयों-बहनों के बीच आज भी घूमती रहती है। जैसे कोई मीठी कहानी, जो दिल को छू लेती है, लेकिन हकीकत में ये सिर्फ एक बुलबुला है, फूट जाता है जब जांच-पड़ताल की जाती है। कुरान और हदीस तो साफ कहते हैं: बिना तहकीक के कोई खबर मत फैलाओ, वरना पछताओगे! (सूरह अल-हुजुरात, 49:6) और हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं: “हर सुनी-सुनाई बात को ना फैलाओ, ये झूठ काफी है।” (सही मुस्लिम)। तो आइए, इस अफवाह की जड़ें खोदें, आर्मस्ट्रांग की खुद की चिट्ठी देखें, और सीखें कि क्यों मुसलमानों को ऐसी बातों पर यकीन करने से पहले दो बार सोचना चाहिए।
अफवाह की शुरुआत: चांद पर ‘अल्लाहु अकबर’ की गूंज
कहानी कुछ यूं है: 1969 में अपोलो 11 मिशन पर चांद पहुंचे आर्मस्ट्रांग ने वहां एक अजीब, मधुर आवाज सुनी, जैसे कोई गाना या जादू। वो हैरान हुए, लेकिन चुप रहे। सालों बाद मिस्र घूमते हुए काहिरा में अजान सुनी, और चिल्लाए, “अरे, ये तो वही आवाज है जो चांद पर आई थी!” फिर क्या, दिल पिघला, इस्लाम कबूल किया, और कुरान पढ़ने लगे। वाह, क्या बात! ये किस्सा 1980 के दशक में फैला, खासकर मुस्लिम मुल्कों में। मलेशिया के ‘द स्टार’ अखबार ने 10 जनवरी 1983 को छापा: आर्मस्ट्रांग मुसलमान बन गए, चांद पर अजान सुनी! दिल्ली के ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने 13 मई 1983 को लिखा: वो पहला आदमी चांद पर, अब मुसलमान! उर्दू किताबों और मैगजीनों में तो तस्वीरें भी थीं, आर्मस्ट्रांग हैरान, अजान की धुन में खोए हुए। मलेशिया, इंडोनेशिया, मिस्र में ये खबर जंगल की आग की तरह फैली, बिना चेक किए।
आर्मस्ट्रांग का इनकार: खुद की चिट्ठी में साफ-साफ जवाब
लेकिन हकीकत क्या? जब ये अफवाह आर्मस्ट्रांग तक पहुंची, तो उन्होंने खुद चिट्ठी लिखी! 5 मई 1983 को दिल्ली के ‘अल-रिसाला’ मैगजीन के प्रेसिडेंट मौलाना वहीदुद्दीन खान को भेजी: “मेरा इस्लाम कबूल करना, चांद पर अजान सुनना, काहिरा में पहचानना, सब झूठ! मलेशिया और इंडोनेशिया के अखबारों ने बिना जांच छाप दिया। सॉरी, अगर ये गलत जर्नलिज्म से आपको तकलीफ हुई।” लेबनान, ओहियो से साइन की हुई ये चिट्ठी साफ कहती है कोई आवाज नहीं सुनी!
अमेरिकी सरकार ने भी दखल दिया, मुस्लिम देशों में एम्बेसीज को स्टेटमेंट भेजे कि ये फेक है। 1983 में आर्मस्ट्रांग को ढेर सारे लेटर मिले, सबका एक जवाब, नो! 2014 में सीबीएस न्यूज ने इसे ‘आर्मस्ट्रांग के 11 बड़े मिथ्स’ में शुमार किया।
क्यों फैलती हैं ऐसी अफवाहें? ईमान और तहकीक का सबक
भाई, सवाल ये है, मुसलमान ऐसी अफवाहों को क्यों सच मान लेते हैं? जबकि कुरान कहता है: “अगर कोई फासिक खबर लाए, तो जांचो, कहीं अंजाने में किसी को नुकसान न पहुंचाओ।” (49:6) और हदीस: “हर सुनी बात फैलाना झूठ है।” एक्सपर्ट्स कहते हैं, ये कहानी इसलिए पॉपुलर क्योंकि साइंस और मजहब को जोड़ती है, जैसे इस्लाम की जीत! लेकिन बिना सबूत ऐसी बातें मानना ईमान को कमजोर करता है।
आज भी जिंदा: वीडियोज और डिबंकिंग जारी
2026 में भी ये अफवाह सोशल मीडिया पर घूम रही, टिकटॉक, यूट्यूब पर फेक वीडियो जहां कोई आर्मस्ट्रांग बनकर कन्वर्शन बताता है, लेकिन वो इम्पोस्टर हैं, जैसे चेक का मिलान शुल्ट्ज! वायरल क्लिप्स अच्छे लोगों द्वारा शेयर होती हैं, लेकिन गलत। नासा और बायोग्राफर्स कहते हैं: चांद पर हवा नहीं, आवाज कैसे आएगी? साइंस से नामुमकिन! रेडिट पर थ्रेड्स कहते हैं: कल्चरल होप्स पर खेलने वाली होक्स।
शेयर करने से पहले चेक करो
ये पुरानी अफवाह एक सबक है: ईमान सच्चाई पर टिका है, न कि बनावटी चमत्कारों पर। मुसलमान भाइयो, कुरान-हदीस मानो, तहकीक करो! अगली बार कोई ‘मिरेकल’ स्टोरी आए, तो रुकना, जांचना, फिर फैलाना। जैसे आर्मस्ट्रांग के मुताबिक, ‘गलत जर्नलिज्म’ से बचो और हकीकत को गले लगाओ।
~क़ौमी फरमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

