(फजलुर्रहमान)
बांगरमऊ, उन्नाव। उर्दू अदब के चमकते सितारे और देश के सुप्रसिद्ध शायर डॉ. बशीर बद्र के इंतकाल की खबर से साहित्य जगत में गहरा शोक व्याप्त हो गया है। जनपद उन्नाव के ऐतिहासिक कस्बे बांगरमऊ और आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय कवियों, शायरों और बुद्धिजीवियों ने उनके निधन पर गहरी शोक संवेदना व्यक्त करते हुए इसे साहित्याकाश के एक युग का अंत बताया है।
नगर में आयोजित शोक सभा में स्थानीय कलमकारों ने डॉ. बशीर बद्र को याद किया और उनके अदबी योगदान को रेखांकित किया।
शोक सभा की अध्यक्षता करते हुए नगर के वरिष्ठ साहित्यकार, कवि व शायर फजलुर्रहमान “फ़ज़्ल” ने डॉ. बशीर बद्र के मशहूर शेर को याद करते हुए कहा,
”उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।” उन्होंने कहा कि बशीर बद्र साहब ने उर्दू शायरी को आम जनमानस की भाषा बनाया। उनके शेरों में जो सादगी, तरलता और आम आदमी का दर्द झलकता था, वह विरले ही देखने को मिलता है। उन्होंने गजल को महफिलों से निकालकर आम आदमी के दिलों तक पहुंचाया। शोक सभा में उपस्थित स्थानीय शायर शम्सुल हसन “शम्स” बांगरमवी ने रूंधे गले से कहा कि बशीर बद्र केवल एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू और हिंदी अदब को जोड़ने वाले एक मजबूत पुल थे। उनके चले जाने से जो शून्य पैदा हुआ है, उसकी भरपाई नामुमकिन है। स्थानीय कवि डॉ रामबिहारी वर्मा “करुणेश” ने संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. बशीर बद्र का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक पूरी तहजीब का रुखसत होना है। उनके लिखे शेर हमेशा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। इस अवसर पर उपस्थित अन्य कवियों और गणमान्य नागरिकों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की और शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना प्रकट की। डॉ. बशीर बद्र का नाता सीधे तौर पर आम आवाम से था। उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका था। स्थानीय शोक सभा में मुख्य रूप से शायर जाने आलम बांगरमवी, कवि मिथलेश कुमार शुक्ला, फखरुद्दीन अंसारी, हक़ीम अकील अंसारी, अफ़ज़ाल, राघव मिश्र, दिनेश तिवारी, बरकत अंसारी, मास्टर जमालुद्दीन, और कस्बे के तमाम उर्दू-हिंदी प्रेमी उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि बशीर बद्र साहब की यादें उनके शेरों के जरिए हमेशा हमारे बीच जिंदा रहेंगी।

