(रईस खान)
आज लखनऊ में जुमे की नमाज़ से पहले शाहदरा मस्जिद का माहौल उस समय खास बन गया, जब मौलाना यूसुफ नदवी साहब ने मुस्लिम उम्मत की एकता और आपसी भाईचारे के विषय पर दिल को छू लेने वाली तकरीर की। उनकी बातों का केंद्र यह था कि आज के दौर में मुसलमानों को अपने छोटे-बड़े मतभेदों से ऊपर उठकर उम्मत की मजबूती और बेहतरी के लिए एकजुट होना चाहिए।
मौलाना साहब ने अपनी तकरीर में सुन्नी और शिया हजरात के बीच मौजूद इख्तिलाफ़ात का जिक्र करते हुए कहा कि इतिहास की बहसों और पुराने विवादों को लेकर आपसी दूरियां बढ़ाने के बजाय उन बातों पर ध्यान देना चाहिए जो पूरी उम्मत को जोड़ती हैं। उन्होंने कुरआन, सुन्नत और इस्लामी अखलाक़ की रोशनी में आपसी सम्मान, सहनशीलता और भाईचारे का पैग़ाम दिया।
उन्होंने सुन्नी जमात के विभिन्न फ़िरकों और मसालिक को भी नसीहत करते हुए कहा कि मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन उन्हें दुश्मनी और तफरके का कारण नहीं बनना चाहिए। उनका कहना था कि जब उम्मत एक मंच पर खड़ी होगी, तभी वह अपने सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक मसलों का बेहतर ढंग से सामना कर सकेगी।
तकरीर के दौरान मौलाना साहब ने इस्लामी इतिहास के विभिन्न दौरों का जिक्र करते हुए बताया कि जब भी मुसलमानों ने आपसी एकता को अपनाया, उन्होंने बड़ी सफलताएं हासिल कीं। वहीं तफरके और आपसी संघर्ष ने हमेशा कमजोरी पैदा की। उन्होंने युवाओं से विशेष रूप से अपील की कि वे सोशल मीडिया और अफवाहों के प्रभाव में आने के बजाय इल्म, तहकीक और अखलाक़ को अपनी पहचान बनाएं।
मोहान रोड स्थित शाहदरा मस्जिद लंबे समय से क्षेत्र में दीन, इबादत और सामाजिक जागरूकता का एक महत्वपूर्ण केंद्र रही है। यहां नियमित रूप से नमाज़, दर्स और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं। मस्जिद ने हमेशा समाज में भाईचारे, अमन और इंसानी हमदर्दी के संदेश को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।
मौलाना यूसुफ नदवी साहब एक प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान परिवार से संबंध रखते हैं और प्रसिद्ध आलिम मौलाना सलमान नदवी साहब के सुपुत्र हैं। वे अपने संतुलित विचारों, इस्लामी अध्ययन और सामाजिक मुद्दों पर सकारात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। उनकी तकरीरों में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ समाजी सुधार, शिक्षा और उम्मत की बेहतरी का संदेश प्रमुखता से दिखाई देता है।

जुमे की इस तकरीर का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही था कि मुसलमानों को अपने साझा मूल्यों और उद्देश्यों पर ध्यान देना चाहिए। मौलाना यूसुफ नदवी साहब ने जोर देकर कहा कि आज की चुनौतियों का सामना केवल इत्तेहाद, आपसी भरोसे और बेहतर सामाजिक भागीदारी के जरिए ही किया जा सकता है।
शाहदरा मस्जिद में दी गई यह तकरीर सिर्फ एक धार्मिक संबोधन नहीं थी, बल्कि उम्मत के लिए एक ऐसी नसीहत थी जो आपसी मोहब्बत, सम्मान और एकजुटता की राह दिखाती है।

