(रईस खान)
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में स्थित देवा शरीफ इन दिनों एक नए बदलाव के दौर से गुजर रहा है। दुनिया भर से आने वाले जायरीन की सहूलियतों को ध्यान में रखते हुए दरगाह परिसर और आसपास के इलाकों में कई काम तेजी से चल रहे हैं। लेकिन इन तमाम बदलावों के बीच जो चीज सबसे ज्यादा महसूस होती है, वह है हजरत वारिस अली शाह रहमतुल्लाह अलैह की मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे की वह तालीम, जो आज भी यहां आने वालों के दिलों को जोड़ती है।
दरगाह के पूरब की तरफ मुख्य गेट से सटकर मौजूद इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु के कर्बला में मौजूद मज़ारे मुबारक की याद में एक शानदार गुंबद का निर्माण कराया जा रहा है। इसकी खूबसूरत बनावट और भव्यता आने वाले दिनों में देवा शरीफ की रौनक में और इजाफा करेगी। निर्माण कार्य को देखने वाले जायरीन भी इस पहल की सराहना करते नजर आते हैं।
सिर्फ निर्माण कार्य ही नहीं, बल्कि जायरीन की सुविधा के लिए भी कई तैयारियां की जा रही हैं। साफ-सफाई, बैठने की व्यवस्था, आवागमन और अन्य जरूरी सुविधाओं को बेहतर बनाने पर काम हो रहा है ताकि दूर-दराज से आने वाले अकीदतमंदों को किसी तरह की परेशानी न हो।
देवा शरीफ आने वाले लोगों का अनुभव आम तौर पर सकारात्मक रहता है। दरगाह के आसपास फूल बेचने वाले दुकानदार अपनी दुकान से फूल खरीदने का हल्का-फुल्का आग्रह जरूर करते हैं, जो देश के अधिकांश धार्मिक स्थलों पर देखने को मिलता है। वहीं कुछ मांगने वाले लोग जायरीन का काफी दूर तक पीछा करते दिखाई देते हैं, जो कभी-कभी असहज स्थिति भी पैदा करते हैं। इसके बावजूद दरगाह के अंदर मौजूद केयर टेकर और अधिकांश दुकानदारों का व्यवहार शालीन, सहयोगी और सम्मानजनक नजर आता है। वे आने वाले जायरीन की मदद करने और उन्हें उचित जानकारी देने का प्रयास करते हैं।
हजरत वारिस अली शाह रहमतुल्लाह अलैह की पहचान केवल एक सूफी संत के रूप में नहीं, बल्कि इंसानियत के पैगामबरों में से एक के रूप में की जाती है। उनकी तालीम का बुनियादी मकसद इंसान को इंसान से जोड़ना था। उन्होंने हमेशा मोहब्बत, अमन, सब्र, सादगी और खुदा की इबादत के साथ इंसानों की खिदमत का संदेश दिया।
वारिस पाक फरमाते थे कि इंसान की असली पहचान उसके अखलाक और किरदार से होती है, न कि उसके मजहब, जाति या हैसियत से। यही वजह है कि उनकी दरगाह पर हर धर्म, हर जाति और हर तबके के लोग एक साथ माथा टेकते हैं। यहां न कोई छोटा है और न बड़ा, सभी को बराबरी का एहतराम मिलता है।

उनकी तालीम यह भी सिखाती है कि दिलों को जोड़ना सबसे बड़ी इबादत है। नफरत को मोहब्बत से और दुश्मनी को भाईचारे से खत्म किया जा सकता है। आज के दौर में जब समाज कई तरह की चुनौतियों से गुजर रहा है, तब वारिस पाक का यह पैगाम और भी ज्यादा अहम हो जाता है।
देवा शरीफ की खासियत यही है कि यहां एक तरफ सदियों पुरानी सूफी परंपरा और रूहानी विरासत मौजूद है, तो दूसरी तरफ समय के साथ आधुनिक सुविधाओं का विकास भी हो रहा है। नए निर्माण कार्य, बेहतर इंतजाम और जायरीन की सहूलियतों के लिए किए जा रहे प्रयास इस बात का संकेत हैं कि देवा शरीफ अपनी ऐतिहासिक और रूहानी पहचान को बरकरार रखते हुए आगे बढ़ रहा है।
जब कोई जायरीन दरगाह की फिजाओं में पहुंचता है, तो उसे सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मोहब्बत, इंसानियत और आपसी भाईचारे का ऐसा मरकज महसूस होता है, जहां हजरत वारिस अली शाह का पैगाम आज भी उसी शिद्दत से गूंजता है, “मोहब्बत बांटो, इंसानियत की खिदमत करो और दिलों को जोड़ो।”

