बढ़ते क़दम –केरल की गलियों से विश्व कप के मैदान तक ___ तहसीन मोहम्मद जमशीद का सुनहरा सफ़र

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 ( रईस खान)

फुटबॉल के दीवानों के लिए केरल हमेशा से एक खास जगह रहा है। वहां के छोटे-छोटे कस्बों और गलियों में बच्चे फुटबॉल को सिर्फ़ खेल नहीं, बल्कि अपने सपनों का हिस्सा मानते हैं। अब इसी मिट्टी से जुड़ी एक कहानी दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल मंच तक पहुंचने वाली है।

कन्नूर जिले के थलास्सेरी से जुड़े एक परिवार के बेटे तहसीन मोहम्मद जमशीद आज विश्व फुटबॉल में नई पहचान बना रहे हैं। महज़ 19 साल की उम्र में वे क़तर की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम का हिस्सा बन चुके हैं और उम्मीद की जा रही है कि आगामी फीफा विश्व कप में उन्हें खेलने का मौका मिल सकता है। अगर ऐसा होता है तो वे विश्व कप के मंच पर उतरने वाले मलयाली मूल के चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल हो जाएंगे।

तहसीन का जन्म क़तर में हुआ। उनके पिता हिबासिल जमशीद मूल रूप से केरल के कन्नूर जिले के थलास्सेरी से हैं और लंबे समय से क़तर में कार्यरत हैं। उनकी माता का नाम शायमा है। परिवार ने हमेशा शिक्षा और खेल दोनों को महत्व दिया, लेकिन तहसीन के दिल में बचपन से ही फुटबॉल के लिए खास जुनून था।

क़तर में फुटबॉल प्रतिभाओं को तैयार करने के लिए एक मजबूत युवा विकास व्यवस्था है। तहसीन ने इसी व्यवस्था के तहत प्रशिक्षण प्राप्त किया। छोटी उम्र से ही उनकी तेज़ रफ्तार, गेंद पर नियंत्रण और आक्रमणकारी खेल शैली ने कोचों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। धीरे-धीरे वे क़तर के प्रतिष्ठित क्लब अल-दुहैल एससी तक पहुंचे, जो देश के सबसे सफल फुटबॉल क्लबों में गिना जाता है।

युवा टीमों में शानदार प्रदर्शन के बाद तहसीन को राष्ट्रीय टीम के लिए बुलावा मिला। उन्होंने विश्व कप क्वालीफिकेशन अभियान के दौरान अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ अपना अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया। यह उनके करियर का बड़ा पड़ाव था। बाद में वे भारत के खिलाफ़ मैच के लिए भी टीम में चुने गए, हालांकि उस मुकाबले में उन्हें मैदान पर उतरने का अवसर नहीं मिला।

इसके बाद क़तर के लिए विश्व कप क्वालीफिकेशन के अंतिम और महत्वपूर्ण मुकाबलों में भी तहसीन टीम का हिस्सा रहे। इससे साफ़ संकेत मिला कि टीम प्रबंधन उन्हें भविष्य के महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में देख रहा है। इतनी कम उम्र में राष्ट्रीय टीम में लगातार जगह बनाना किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

तहसीन की कहानी सिर्फ़ एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं है। यह उन लाखों प्रवासी भारतीय परिवारों की कहानी भी है, जो विदेशों में रहते हुए अपने बच्चों को बेहतर अवसर देने का सपना देखते हैं। क़तर में जन्मे और पले-बढ़े तहसीन की जड़ें आज भी केरल से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि उनकी उपलब्धि पर क़तर के साथ-साथ केरल के फुटबॉल प्रेमी भी गर्व महसूस कर रहे हैं।

केरल में फुटबॉल केवल खेल नहीं, बल्कि एक भावना है। गांवों के मैदानों से लेकर शहरों के क्लबों तक, यहां फुटबॉल लोगों की जिंदगी का हिस्सा है। ऐसे माहौल में तहसीन की सफलता युवा खिलाड़ियों को यह संदेश देती है कि मेहनत, अनुशासन और सही मार्गदर्शन के बल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा जा सकता है।

आज जब दुनिया भर के युवा सोशल मीडिया और त्वरित सफलता की ओर आकर्षित होते हैं, तहसीन का सफ़र हमें बताता है कि असली सफलता लगातार मेहनत और धैर्य से मिलती है। उन्होंने धीरे-धीरे हर स्तर पर खुद को साबित किया और अब विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े मंच के दरवाजे पर खड़े हैं।

यदि आगामी फीफा विश्व कप में तहसीन मोहम्मद जमशीद मैदान पर उतरते हैं, तो यह केवल उनके परिवार या क़तर की टीम के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मलयाली और भारतीय प्रवासी बिरादरी के लिए गर्व का क्षण होगा।

कभी फुटबॉल के सपने देखने वाला एक किशोर आज विश्व कप की दहलीज पर खड़ा है। यह कहानी बताती है कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती। अगर इरादे मजबूत हों, तो कन्नूर की गलियों से निकलकर भी दुनिया के सबसे बड़े स्टेडियम तक पहुंचा जा सकता है।

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